पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण एक तरफ जहां पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति प्रभावित हुई है। वहीं हीलियम की भी आपूर्ति भी इस संकट के कारण प्रभावित हुई है। बता दें कि, हीलियम को गैस रूप में ले जाना मुश्किल होता है, इसलिए इसे बेहद कम तापमान पर तरल रूप में क्रायोजेनिक कंटेनरों में रखा जाता है।
अमेरिका-इस्राइल व ईरान युद्ध ने वैश्विक हीलियम सप्लाई को गहरा झटका दिया है। कतर में उत्पादन ठप होने और होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधित होने से दुनिया की एक-तिहाई हीलियम आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर एमआरआई स्कैन, सेमीकंडक्टर निर्माण वअन्य हाई-टेक उद्योगों पर पड़ेगा।
यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के अनुसार 2025 में कतर ने लगभग 6.3 करोड़ क्यूबिक मीटर हीलियम का उत्पादन किया, जो वैश्विक उत्पादन करीब 19 करोड़ क्यूबिक मीटर का लगभग एक-तिहाई है। होर्मुज स्ट्रेट बंद करने की घोषणा के बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही काफी घट गई। इससे चिप उद्योग को भी विपरीत हालात का सामना करना पड़ रहा है। यह असर भी जोखिम भरा है।
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परिवहन में बाधा और तकनीकी चुनौती
हीलियम को गैस रूप में ले जाना मुश्किल होता है, इसलिए इसे बेहद कम तापमान पर तरल रूप में क्रायोजेनिक कंटेनरों में रखा जाता है। लेकिन इसे 45 दिनों के भीतर उपयोग या परिवहन करना जरूरी होता है, क्योंकि धीरे-धीरे तापमान बढ़ने पर यह फिर गैस बनकर उड़ जाता है। कतर से लगभग पूरा हीलियम निर्यात होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए समुद्र के रास्ते होता है और इसके लिए कोई वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध नहीं है। पश्चिम एशिया में मौजूदा तनाव के कारण यह पूरी सप्लाई चेन बाधित हो गई है।
एशियाई देश ज्यादा प्रभावित
बता दें कि, दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और चीन कतर से हीलियम के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। हालांकि अधिकतर सप्लाई लंबी अवधि के अनुबंधों के तहत होती है, जिससे कीमतों का असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन आपूर्ति में कमी तय मानी जा रही है।