देखते ही देखते, घर पानी में डूब गए हैं। घर में रखा हुआ धान भी हम निकाल नहीं पाए। गौशाला में बांधे पशु तक खोल नहीं पाए। कई पशु पानी में बह गए। किसी तरह से जान बचाकर भगाने में सफल हुए। आज इस तरह से सड़क के किनारे तिरपाल के छत के नीचे जीवन जीने को मजबूर होना पड़ रहा है। कहते हुए फफक पड़ती हैं, सुनमनी दास। दास का परिवार डिब्रूगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 35 किमोटीर सेरपाखाटी में बूढ़ीदीहिंग नदीं (जो कि ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है) में आए बाढ़ के कारण सड़क किनारे तिरपाल का अस्थायी घर बनाकर रहने को मजूबर है। दास कहती हैं, हमारा सब कुछ लूट गया है। बाढ़ के कारण हमें अगले वर्ष की चिंता नहीं है। क्योंकि अगले बर्ष के लिए तो फसल हो जाएगा, लेकिन सबसे बड़ी चिंता है, कि अब अगली फसल होने तक हम खाएंगे क्या। क्योंकि हमने जो धान घर में रखा था, वह पानी से खराब हो गया है। हम तो केंद्र और राज्य सरकार से केवल इनती मांग कर रहे हैं कि जब तक हमारी फसल नहीं आए, हमारे खाने-पीने का ध्यान रखें।
बाढ़ पीड़ितों के लिए बनाए गए राहत कैंप।
- फोटो : Amar Ujala
असम में बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित।
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डिब्रू-शैखोवा नेशनल पार्क पर मंडरा रहा है खतरा
तिनसुकिया जिले में स्थित डिब्रू-शैखोवा नेशनल पार्क पर खतरा मंडरा रहा है। तिनसुकिया जिले के गुईजान निवासी साहनी कहते हैं, निश्चित रूप से डिब्रू-शैखोवा नेशनल पार्क को खतरा है। हर साल ब्रह्मपुत्र अपना दायरा बढ़ा रही है। ऐसे में अगर समय रहते उपाए नहीं किए गए तो एक दिन यह पार्क नदी में समा जाएगा। कहते हैं, हमें केंद्र और राज्य सरकार पर पूरा भरोसा है। लेकिन समय रहते कें उपाए नहीं किए तो ब्रह्मपुत्र नदी एक दिन तिनसुकिया जिला मुख्यालय तक पहुंच जाएगी और वहां पर नांव चलेंगी। क्योंकि हमने देखा है कि 1995 तक एक छोटा नाला था और अथाह ब्रह्मपुत्र में तब्दील हो चुकी है। पानी अपना रुख किधर कर लेगी, किसी को मालूम नहीं है। जिला मुख्यलय यहां से करीब 11 से 15 किलोमीटर के दायरे में है।
असम में बाढ़ की वजह से कैंप में रहने को मजबूर लोग।
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गर्भवती और पैरालाइसिस मरीज को घर जैसी सुविधाएं
डिब्रूगढ़ जिले के खवांग सीएचसी के अंतर्गत कई सरकारी राहत शिविर बनाए गए हैं, जिनमें हजारों लोग शरण लिए हुए हैं। खवांग हायर सेंकेंजरी स्कूल में बनाए गए राहत कैंप में दो गर्वभती महिलाएं भी हैं। सुमित्रा दास सात माह की गर्भवती महिला ने बताया कि घर में जो सुविधाएं थीं, राहत कैंप में भी सारी सुविधाएं मिल रही हैं। हर रोज दो बार डॉक्टर आकर जांच करते हैं। दूध और फल से लेकर सारी सुविधाए सरकार की ओर से दी जा रही है। कहती हैं, मामा (असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को प्यार से लोग मामा कहते हैं) ने सारी सुविधा दी है। किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है। इसी तरह से इसी कैंप में 80 वर्षीय बोगा दास पैरेलाइसिस मरीज भी हैं। उनको डीएम की ओर से व्हील चेयर दी गई है।
कैंप में चार सौ लोग, मौजूद रहती है डॉक्टरों की टीम: गोगोई
कैंप को देख-रेख कर रहे अधिकारी नीरेन गोगोई ने बताया कि इस कैंप में करीब 400 लोग हैं। डॉक्टरों की टीम है, जो रात दस बजे तक रहती है। रात को डॉक्टरों की क्वीक टीम तैयार रहती है। उन्होंने कहा, मजीर को किसी तरह की दिक्कत होने पर पास ही सीएचसी है। जरूरत पड़ने पर तुरंत डिब्रूगढ़ स्थित असम मेडिकल कॉलेज रेफर करते हैं। सरकार की ओर से जारी सभी दिशा निर्देशों को कड़ाई के साथ पालन किया जा रहा है।
असम के बाढ़ग्रस्त इलाकों का मंजर
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चौबीसों घंटे हैं तैयार, किसी चीज की नहीं कमी: एडीसी
डिब्रूगढ़ जिले की एडीसी डॉ. मोनिका बोरा ने कहा, जिला प्रशासन चौबीसों घंटे तैयार है। भले ही आज ब्रह्मपुत्र और बूढ़ीदिहींग नदी में पानी कमा है, लेकिन मौसम का कोई भरोसा नहीं है। एनडीआरएप, एसडीआरएफ, सीविल वॉलंटियर्स, जिला प्रशासन, पुलिस और बाक सुरक्षा एजेंसियां हर दम तैयार है। डिब्रूगढ़ जिले के करीब 131 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं। पहले 31 राहत कैंप थे, अब केवल 21 रह गए हैं। इनमें 2600 से अधिक लोग आश्रय लिए हुए हैं। उन्होंने बताया कि अब तक 1900 क्विटल चावल, 313 क्विंटल दाल, 3349 क्विंटल पशु आहार, 37.96 क्विंटल पोहा, 10, 7 27 लीटर अमूल ताजा दूध, 4798 पैकिट वैबी डायर और 2110 सेनेटरी पैटकी पैकिट दे चुके हैं। उन्होंने कहा, बाढ़ पीड़ितों को हर संभव मदद की जा रही है। जिला प्रशासन के पास किसी भी चीज की कमी नहीं है।