सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिज्ञासा, ज्ञान का मूल है और इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ज्ञान से ही समझ आती है। वेबसाइट पर लिंग परीक्षण से संबंधित विज्ञापनों पर रोक लगाने की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि हम शोधकर्ता के चयन के अधिकार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। किसी चीज को जानना मौलिक अधिकार है और इस पर रोक लगाना खतरनाक होगा।
पीठ ने कहा ‘लिंग परीक्षण को लेकर किसी तरह का विज्ञापन नहीं होना चाहिए। अगर कोई ऐसा करता है तो वह अपराध है। मान लिया जाए कि हम वेबसाइट पर लिंग परीक्षण से संबंधित तमाम जानकारी पर प्रतिबंध लगा देते हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद-19 (1) (क) का उल्लंघन होगा। इसका अलग स्थान और शुद्धता है और हम नहीं समझते कि कोई भी व्यक्ति इससे इत्तफाक न रखता हो।’
वहीं सर्च इंजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी ने यह दावा किया कि उनकी ओर से किसी को लिंग परीक्षण संबंधी विज्ञापन की इजाजत नहीं दी जाती है, लेकिन वह लिंग परीक्षण से जुड़ी सभी जानकारी पर रोक नहीं लगा सकते। उनका कहना था कि शोध और अन्य उद्देश्यों के लिए इससे संबंधित जानकारी उपयोगी होती है।
वहीं अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा कि जानने का अधिकार और विज्ञापन के बीच के अंतर को पहचानने की जरूरत है। जबकि याचिकाकर्ता साबू मैथ्यू जार्ज की ओर से पेश वकील संजय पारिख ने कहा कि इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि सर्च इंजन ऐसे मामलों में कैसे सक्रिय भूमिका निभा सकता है। पीठ ने मामले की सुनवाई 13 अप्रैल तक के लिए टालते हुए यह संकेत दिया कि उस दिन याचिका का निपटारा कर दिया जाएगा।