अब जाकर उम्मीद की हल्की किरण नजर आने लगी है। लेकिन यह किरण कब रोशनी बनेगी अभी कुछ भी कह नहीं सकते। कितना समय गुजर गया और अभी कितना समय गुजरेगा, कुछ कह नहीं सकते। हाईकोर्ट ने मुस्तैदी नहीं दिखाई होती तो आज जो आरोपी ईडी की गिरफ्त में हैं, अन्यथा वे आराम से घूम रहे होते। किस तरह से घपला हुआ और किस तरह से मेधावियों को वंचित रखकर दूसरों को नौकरी दे दी गई, सुनकर ही शरीर सिहर उठता है। सच कहूं तो अब लोगों का दीदी (मुख्यमंत्री ममता बनर्जी) से भरोसा उठने लगा है। बस कोर्ट से ही हम लोगों को उम्मीद है। ये कहते हुए महादेब दोलोई निराश हो जाते हैं।
महादेब ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था
महादेब ने ही सबसे पहले एसएससी भर्ती घोटाला मामले में 2019 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। बांकुडा जिले के पीड़ाबाकरा के रहने वाले महादेब ने अपर प्राइमरी और ग्रुप डी नॉन-टीचिंग के लिए आवेदन किया था। वे भूगोल में एमए और बीएड हैं। वह कहते हैं, 2016 में परीक्षा हुई और फिर 2017 में रिजल्ट निकला। ग्रुप डी नॉन-टीचिंग के लिए मैंने अप्लाई किया था, काउंसिलिंग हुई। हम नौकरी के लिए इंतजार कर रहे थे, लेकिन नौकरी नहीं मिली। कम नंबर वालों को नौकरी मिल गई, हमें नहीं मिली। इस पर हमने 2019 में अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद 2021 में इस मामले में हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए।
इस पर यह मामला डिवीजन बेंच के पास चला गया। इस बीच, हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुब्रत तालुकदार और न्यायमूर्ति आनंद कुमार मुखर्जी की खंडपीठ ने पूर्व न्यायाधीश आरके बाग की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया। मई 2022 में बाग कमेटी ने हाईकोर्ट में रिपोर्ट दाखिल कर बताया कि स्कूल सेवा आयोग के जरिए ग्रुप सी और ग्रुप डी में नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। कलकत्ता हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में बताया गया कि ग्रुप सी में 381 लोगों जबकि ग्रुप डी में 609 लोगों को गैरकानूनी तरीके से नियुक्त किया गया है। धांधली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन 381 लोगों में से 222 ऐसे लोग थे जिन्होंने परीक्षा ही नहीं दी थी लेकिन उन्हें शिक्षक के तौर पर नियुक्त कर दिया गया, जबकि बाकी 159 लोगों ने परीक्षा पास नहीं की थी फिर भी मेरिट लिस्ट में इनका नाम लाकर इन्हें नियुक्ति दी गई। इसके अलावा बाग कमेटी के अधिवक्ता अरुणाभ बनर्जी ने कहा कि जिन लोगों को गैरकानूनी तरीके से नियुक्त किया गया उनके नंबरों को फर्जी तरीके से बढ़ाया गया। उनका ओएमआर सीट (उत्तर पुस्तिका) भी बदलकर उसमें प्रश्न के उत्तरों को बदला गया।
कोर्ट चाहे तो असली हकदारों को नौकरी दिला सकता है
अब क्या लगता है, इस सवाल के जवाब में महादेब कहते हैं, अभी भी कुछ नहीं कह सकते। सब कुछ कोर्ट पर निर्भर करता है। कोर्ट चाहे तो असली हकदारों को नौकरी दिला सकता है। देखिए ना, हमारी उम्र भी तो बढ़ रही है। पूरा कोरोना काल बेरोजगारी में निकल गया। कितने कष्ट में हैं हम सब। इसकी किसी को फिक्र ही नहीं है। सपने चकनाचूर हो गए हैं। महादेब कहते हैं ये बात तो बिल्कुल सही है कि इस समय बंगाल के लोगों में काफी गुस्सा है। पिछले दिनों ही आपने देखा होगा कि एक भद्र महिला ने किस तरह से पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी पर चप्पल फेंक कर हमला किया था। यह दिखाता है कि आम जन में इस समय इस घोटाले को लेकर कितना आक्रोश है। गरीबों की आह लगी है। तभी तो उनका यह हश्र हो रहा है। दीदी (मुख्यमंत्री ममता बनर्जी) ने कई बार आश्वासन दिया, लेकिन हुआ कुछ नहीं। महादेब कहते हैं, मुझे उस दिन खुशी होगी जब हमारे सभी मेधावियों को नौकरी मिलेगी। आज टीचिंग और नॉन टीचिंग के लिए विभिन्न मंचों से मेधावी अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। मैंने जो पहल की उसका लाभ सभी को मिले। सभी को नौकरी मिले। बस यही कामना करता हूं।
10 से 25 लाख रुपये था रेट!
बताया जाता है कि हर वर्ग की भर्ती के लिए रेट फिक्स था। सूत्र बताते हैं कि प्राइमरी के लिए 10 लाख रुपये, ग्रुप सी और डी के लिए 10 लाख रुपये, अपर प्राइमरी के लिए 15 से 18 लाख रुपये और नौवीं से बारहवीं के लिए 20 से 25 लाख रुपये लिए जाते थे।
अदालत के दखल से सामने आया घोटाला
मई 2022 में ही कलकत्ता हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) की सिफारिशों पर पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा की गई कथित अवैध नियुक्तियों की सीबीआई जांच कराने का निर्देश दिया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस सिलसिले में बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी को सीबीआई के समक्ष पेश होने का निर्देश भी दिया था। न्यायमूर्ति सुब्रत तालुकदार और न्यायमूर्ति एके मुखर्जी की खंडपीठ ने स्कूल सेवा आयोग द्वारा अनुशंसित शिक्षक एवं गैर शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती में अनियमितताओं को सार्वजनिक घोटाला करार दिया और कहा कि न्यायमूर्ति अभिजीत गांगुली की एकल पीठ का मामले की सीबीआई जांच का आदेश गलत नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।