संसद की संयुक्त समिति ने बुधवार को वक्फ (संशोधन) विधेयक की रिपोर्ट और प्रस्तावित कानून के संशोधित संस्करण को बहुमत से पारित कर दिया। इस विधेयक को 15-11 मतों से मंजूरी मिली। मंजूरी मिलने के बाद विपक्षी सदस्यों ने इस विधेयक की आलोचना की है और इसे असंवैधानिक बताया। उनका कहना है कि यह विधेयक सरकार को मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है, जिससे वक्फ बोर्ड का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। हालांकि समिति ने सांसदों को अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए शाम 4 बजे तक का समय दिया गया है।
जगदंबिका पाल का बयान
समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने कहा कि विधेयक में किए गए कई संशोधनों ने विपक्ष की चिंताओं का समाधान किया है। उनका कहना था कि जब यह विधेयक पारित होगा, तो वक्फ बोर्ड को अपने काम को पारदर्शी और प्रभावी तरीके से करने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी बताया कि इस विधेयक के तहत पहली बार पसमांदा मुसलमानों (जो पिछड़े वर्ग के हैं), गरीबों, महिलाओं और अनाथों को वक्फ के लाभार्थियों में शामिल किया गया है।
अब ओम बिरला को सौंपी जाएगी रिपोर्ट
साथ ही मामले में वरिष्ठ भाजपा नेता ने बताया कि वक्फ (संशोधन) विधेयक की रिपोर्ट गुरुवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी जाएगी। साथ ही जब पत्रकारों ने मामले में पूछा कि क्या विधेयक 31 जनवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र में पारित होगा, तो उन्होंने कहा कि अब यह फैसला संसद और संबंधित अधिकारियों को करना है। समिति ने 8 अगस्त 2024 को अपने गठन के बाद से राष्ट्रीय राजधानी में 38 बैठकें कीं और हितधारकों से परामर्श करते हुए निष्कर्ष पर पहुंची।
विपक्षी दलों ने की विधेयक की आलोचना
विपक्षी सांसदों ने इस प्रक्रिया को अलोकतांत्रिक बताया है। साथ ही आरोप लगाया कि उन्हें अंतिम रिपोर्ट का अध्ययन करने और अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए बहुत कम समय दिया गया। शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि सभी विपक्षी सदस्य अपनी असहमति दर्ज कराएंगे।
साथ ही विपक्षी दलों, जैसे कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, आप और एआईएमआईएम के सांसदों ने विधेयक की तीखी आलोचना की। कुछ विपक्षी सांसदों ने अपनी असहमति दर्ज कराई है, जबकि अन्य ऐसा करने के लिए शाम 4 बजे तक समय ले रहे थे। वे यह आरोप लगा रहे हैं कि 655 पन्नों की रिपोर्ट उन्हें बहुत कम समय में दी गई और इसे पढ़ने का समय नहीं मिला।
विधेयक में महत्वपूर्ण बदलाव
विधेयक में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि वक्फ द्वारा उपयोगकर्ता का खंड हटाया गया है, और यह साफ किया गया है कि वक्फ संपत्ति से संबंधित मामले अब पूर्वव्यापी तरीके से नहीं खोले जाएंगे, जब तक कि वे विवादित न हों या सरकारी संपत्ति न हों। इसके अलावा, वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने का समर्थन किया गया है, ताकि वे वक्फ मामलों में रुचि रखने वाले या विवादों में पक्षकार बन सकें।
बता दें कि विधेयक के तहत, विवादों से जुड़े मामलों में जिला कलेक्टर की जांच शक्ति को खत्म कर दिया गया है और राज्य सरकार को अब इन मामलों की जांच करने के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी नामित करने का अधिकार मिल गया है।
संचालन में कई बदलाव, एक नजर
विधेयक में वक्फ बोर्डों के संचालन में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जैसे कि अब बोर्ड में गैर-मुस्लिम और कम से कम दो महिला सदस्यों को नामित किया जाएगा। इसके अलावा, केंद्रीय वक्फ परिषद में एक केंद्रीय मंत्री, तीन सांसद, दो पूर्व न्यायाधीश, चार 'राष्ट्रीय ख्याति' के व्यक्ति और वरिष्ठ सरकारी अधिकारी होंगे, जिनमें से कोई भी इस्लामी धर्म से संबंधित नहीं होगा।
समिति ने कल पेश की थी रिपोर्ट
संसदीय समिति ने वक्फ विधेयक की समीक्षा के बाद 655 पन्नों की रिपोर्ट जारी की, जिसमें सभी बदलावों को शामिल किया गया है जो विधेयक के सदस्यों द्वारा सुझाए गए थे। हालांकि, विपक्ष ने आरोप लगाया है कि उनके द्वारा किए गए संशोधनों को इस रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया है।
इसके बाद समिति ने यह स्पष्ट किया है कि संशोधित कानून लागू होने के बाद मौजूदा वक्फ संपत्तियों की जांच नहीं की जाएगी, अगर वे संपत्तियां विवादित नहीं हैं या सरकार की संपत्ति नहीं हैं। बता दें कि समिति ने 14 संशोधनों को मंजूरी दी है, जिनमें अधिकतर संशोधन भाजपा या उसके सहयोगी सांसदों द्वारा सुझाए गए हैं।
एक नजर वक्फ विधेयक पर
गौरतलब है कि वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 को केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में पेश किया था और इसे 8 अगस्त 2024 को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया था। इस विधेयक का उद्देश्य 1995 में बने वक्फ अधिनियम में संशोधन करना है ताकि वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और विनियमन से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सके।