मध्य प्रदेश में व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) परीक्षा के जरिये एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिला लेने वाले 634 छात्रों को सुप्रीम कोर्ट से भी तगड़ा झटका लगा, जब शीर्ष अदालत ने उन्हें अनैतिक तरीके से इसमें सफल होने का दोषी माना और उनके इस कृत्य को ‘धोखाधड़ी’ करार दिया। इन सभी छात्रों का दाखिला रद्द किए जाने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया है। इन छात्रों के दाखिले 2008 से 2012 केबीच हुए थे।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि छात्रों के कृत्य ‘अस्वीकार्य बर्ताव’ के दायरे में पाए गए हैं और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेष अधिकार का इस्तेमाल करने इजाजत नहीं दी जा सकती। 87 पन्नों के अपने फैसले में पीठ ने कहा, ‘इस मामले में जो परिस्थितियां और तथ्य मौजूद हैं, उनके आधार पर याचिकाकर्ताओं के कृत्य कानून का पूर्ण उल्लंघन दायरे में पाए गए हैं।
हमारी नजर में उनकी करतूत धोखाधड़ी, न्यायसंगत सामाजिक व्यवस्था का उल्लंघन करना है और किसी व्यक्ति या समाज के फायदे के लिए राष्ट्रीय महत्व के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। एमबीबीएस कोर्स में उनके दाखिले को वैध करना सही नहीं होगा।’
पीठ ने कहा है कि अनुच्छेद-142 के तहत मिले विशेष अधिकार का इस्तेमाल ऐसे छात्रों के लिए नहीं किया जा सकता। अगर हम देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसकी बुनियाद में नैतिकता है, तो हम ऐसे राष्ट्र के निर्माण के बारे में सोचेंगे, जहां कानून का शासन हो।
गलत तरीके से लिए गए दाखिले को माफ नहीं किया जा सकता
- फोटो : SELF
मालूम हो कि पहले इस मामले में दो सदस्यीय पीठ की अलग-अलग राय थी। लिहाजा इस मामले को तीन सदस्यीय पीठ के पास भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया था लेकिन एक जस्टिस जे चेलमेश्वर ने मामले में अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल किया था और कहा था कि अगर अभ्यर्थियों ने एमबीबीएस की पढ़ाई कर ली है तो उसे बर्बाद नहीं होने देना चाहिए।
गलत तरीके से लिए गए दाखिले के बाद जो ज्ञान अर्जित हुआ है, उसे मिटाया नहीं जा सकता। वह चाहते हैं कि इन छात्रों को कोर्स पूरा करने की इजाजत दी जाए और भरपाई के तौर पर समाज को सेवा दें और इसके लिए बिना दावे के वह सेना को सेवा दें। इसके लिए ये 5 साल तक देश की सेवा करें और इसके लिए नियमित वेतन और फायदे नहीं मिलेंगे।
वहीं पीठ के दूसरे जज अभय मोहन सप्रे ने मामले में अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था और कहा था कि गलत तरीके से लिए गए दाखिले को माफ नहीं किया जा सकता। मालूम हो कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 में इन छात्रों की अर्जी खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट में 2008 से 2012 के बीच व्यापम के जरिए हुई प्रवेश परीक्षाओं को निरस्त कर दिया था। आरोप था कि परीक्षा बोर्ड ने गलत तरीके से परीक्षाएं ली थी, इसका फायदा 634 छात्रों को मिला था।
रसूखदार कानून के दायरे से बाहर
मध्यप्रदेश में 634 मेडिकल छात्रों का दाखिला रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आई है। इस फैसले से प्रभावित एक छात्रा का कहना है कि उसे समझ में नहीं आ रहा है कि अब उसका क्या होगा।
वहीं व्हिसल ब्लोअर कह रहे हैं कि व्यापमं घोटाले में शामिल रसूखदार अब भी कानून के दायरे से बाहर हैं। उधर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अपने पद से त्यागपत्र देने की मांग की है।
इंदौर में रह रहीं भारती अचाले ने फोन पर बातचीत में बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष ही भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज से इंटर्नशिप की है। उन्हें सिर्फ यह जानकारी है कि सुप्रीम कोर्ट ने एडमिशन रद्द किया है।
व्यापमं घोटाला
मध्य प्रदेश में व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) उन पोस्ट पर भर्तियां या एजुकेशन कोर्स में एडमिशन करता है, जिनकी भर्तियां मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन नहीं करता।
- ये परीक्षाएं करवाता है व्यापमं : मेडिकल, इंजीनियरिंग, पुलिस, नापतौल इंस्पेक्टर, शिक्षक आदि।
- घोटाले का खुलासा : 2013 में पुलिस ने एमबीबीएस की भर्ती परीक्षा में बैठे कुछ फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र दूसरे छात्रों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे। बाद में पता चला कि प्रदेश में सालों से एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जो फर्जीवाड़ा कर छात्रों को एमबीबीएस में इसी तरह एडमिशन दिलाता है।
- पहली गिरफ्तारी : जुलाई 2013 में डॉ. जगदीश सेंगर की गिरफ्तारी हुई। सेंगर ने पूछताछ में कबूल किया कि उसने तीन साल के दौरान बहुत से छात्रों को मेडिकल कोर्स में गलत तरीके से एडमिशन दिलाया था।
- सीबीआई जांच : घोटाले की जांच पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की निगरानी में एसआईटी ने की थी। लेकिन बाद में जांच का जिम्मा सीबीआई के हवाले कर दिया गया।
- घोटाला सामने आने के बाद साल 2008-12 में सभी दाखिले रद्द कर दिए गए थे।
- फर्जीवाड़े में मध्य प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों और नेताओं के नाम इस मामले में आए। घोटाले से जुडे़ कई लोगों की संदिग्ध मौत के बाद इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई।