कहां किसकी प्रतिष्ठा दांव पर
चौधरी अजीत सिंह के लिए जाटलैंड नाक का सवाल बन गया है। बागपत में बेटे जयंत और मुजफ्फरनगर में खुद अजीत के लिए भी। मेरठ से सांसद रहे राजेन्द्र अग्रवाल के लिए भी अहम है। काफी कड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। यही स्थिति गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह के लिए है। गठबंधन के सुरेश बंसल से कड़ी चुनौती मिल रही है। कांग्रेस की डॉली शर्मा भी उनकी राह में रोड़ा हैं। नोएडा में डॉ. महेश शर्मा के लिए भी नोएडा के ग्रामीण क्षेत्र में चुनौती खड़ी हो रही है।
सहारनपुर में कांग्रेस के इमरान मसूद पिछले चुनाव में बहुत कम वोट से हारे थे। इस बार गठबंधन ने वहां से फजलुर्रहमान बर्क को प्रत्याशी बनाया है। दो अल्पसंख्यक चेहरा होने के बाद भी भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। यही स्थिति कैराना से है। उपचुनाव में हारी भाजपा फूंक-फूंककर कदम रख रही है।
मतदान का क्या होगा असर?
मतदान को लेकर जहां चुनाव आयोग ने कमर कस रखी है, वहीं भाजपा, सपा-बसपा-रालोद और कांग्रेस के रणनीतिकारों का जोर हर बूथ पर होने वाले मतदान से रुझान को भांपने पर टिका है। सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि वोटों का ध्रुवीकरण होगा या नहीं। भाजपा ने चुनाव को राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रवाद का रंग दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अली,अली के जवाब में बजरंग बली का नारा दे डाला। प्रधानमंत्री मोदी भी सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के बहाने चुनाव को नई वेवलेंथ दे रहे हैं।
वहीं कांग्रेस, सपा-बसपा-रालोद इसे भाजपा की बांटने की राजनीति करार दे रहे हैं। मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल खड़ा करके बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी के गलत प्रावधान, किसानों की समस्या को मुद्दा बना रहे हैं। माना जा रहा है कि पश्चिम के मतदाताओं का रंग देखकर राजनीतिक पार्टियां अपनी आगे की रणनीति में बदलाव पर ध्यान दे सकती हैं।