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भारत-चीन सीमा पर विवाद के बीच इस तरह मदद कर रहे हैं लद्दाखी, सैनिकों के लिए भेजते हैं फल-सब्जियां

Mon, 14 Sep 2020 06:25 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

चुशुल इलाके में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई झड़प के दौरान आसपास के लोगों ने पोर्टर बनकर सेना की बड़ी मदद की है। इस क्षेत्र के पार्षद कोन्चोक स्टेंजिन बताते हैं, हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन जो भी है, हम उसी के जरिए अपनी सेना की मदद करने का प्रयास करते हैं...
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Volunteers from Maan & Merak extending logistic supports to Army deployed at LAC - फोटो : Konchok Stanzin (Twitter)
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विस्तार
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भारत-चीन सीमा पर विवाद जारी है। लद्दाख की सड़कों पर सेना का साजो-सामान ले जाने वाली भारी गाड़ियों के काफिले देखे जा सकते हैं। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लद्दाखी सैनिकों के लिए स्थानीय फल सब्जियां भेजते हैं। पानी के बड़े-बड़े केन भरकर उन्हें सड़क किनारे रख देते हैं। वहां से आर्मी या आईटीबीपी का काफिला गुजरता है, तो वह सामान उनकी गाड़ियों में रखवा दिया जाता है।

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चुशुल इलाके में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई झड़प के दौरान आसपास के लोगों ने पोर्टर बनकर सेना की बड़ी मदद की है। इस क्षेत्र के पार्षद कोन्चोक स्टेंजिन बताते हैं, हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन जो भी है, हम उसी के जरिए अपनी सेना की मदद करने का प्रयास करते हैं। खाने पीने का वह सामान, जो इसी इलाके में पैदा होता है, वह सेना को दिया जाता है।

हमने बॉर्डर के निकटवर्ती सभी गांवों के लोगों से कहा है कि वे युवाओं की टोलियां तैयार रखें। उनके लिए किसी भी समय पोर्टर के लिए बुलावा आ सकता है। चुशूल से दर्जनों युवक सेना के साथ पोर्टर का काम कर रहे हैं। स्थानीय लोग अपने सैनिकों के लिए खाने-पीने का सामान लेकर फॉरवर्ड-पोस्ट तक पहुंचा रहे हैं।
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कोन्चोक स्टेंजिन के अनुसार लोगों में चीन को लेकर भारी गुस्सा है। पिछले कुछ दशकों से चीन जो भी हरकत कर रहा है, उसका असर ग्रामीण इलाकों पर देखने को मिला है। पहले हमारे लोग अपने पशुओं को बहुत दूर ले जाते थे, लेकिन अब वहां रोक लग गई है। इससे कुछ न कुछ शक होता है कि यहां सब ठीक नहीं है।

खैर, सरकार अपने स्तर पर अच्छा कर रही है। चीनी सैनिकों को उनकी भाषा में जवाब दिया जा रहा है। चुशुल क्षेत्र के बॉर्डर पर लंबे समय तक तनाव जारी रहा है। 1959 और 62 में भी चीन ने इस इलाके पर कब्जा करने की साजिश रची थी, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली। इस बार जब यहां से गाड़ियों के काफिले गुजरे और हवाईजहाजों की गर्जना शुरू हुई, तो लोगों को पहली बार लगा कि स्थिति गंभीर हो चली है।

ग्रामीणों के पास जो भी मौजूदा संसाधन हैं, उनके मुताबिक हम अपनी सेना की मदद कर रहे हैं। लोकल फल सब्जियों से भरी टोकरी सीमा तक पहुंचाई जा रही हैं। हमारे यहां पर गोभी दस किलोग्राम से अधिक वजन की होती है। कद्दू तो इससे भी तीन चार गुना भारी होता है।

सक्ती के पार्षद जीपी वांगयाल के अनुसार, हम सैनिकों को ताजे फल और सब्जियां मुहैया कराने का प्रयास करते हैं। मात्रा थोड़ी हो या ज्यादा, बस वह हमारे जवानों तक पहुंचनी चाहिए। इसी तरह लोकल फल को बिना साफ किए पैक कर दिया जाता है। जवानों को वह फल जूस के रूप में मिल जाता है।

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