देश के आध्यात्मिक महापुरुष स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाई जाएगी। उन्होंने अल्पायु में धर्म, दर्शन, जीवन, विश्व बंधुत्व जैसे विषयों पर महारत हासिल करने के साथ जो संदेश दिए वे आज भी मानवता के कल्याण की राह दिखाते हैं। वह कहते थे, विचार व्यक्तित्व के जनक होते हैं, जो आप सोचते हैं, वैसे बन जाते हैं।
विश्व में भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत और योग को प्रसारित करने में विवेकानंद की महत्वपूर्ण भूमिका है। ब्रिटिश भारत के दौरान राष्ट्रवाद को अध्यात्म से जोड़ने में इनकी भूमिका अहम है। विवेकानंद ने जातिवाद, शिक्षा, राष्ट्रवाद, धर्म निरपेक्षतावाद, मानवतावाद पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उन पर उपनिषद्, गीता के दर्शन, बुद्ध एवं ईसा मसीह के उपदेशों का प्रभाव है। उन्होंने शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन में वैश्विक ख्याति अर्जित की तथा इसके माध्यम से भारतीय अध्यात्म का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार हुआ।
दो साल न्यूयॉर्क में रहे
शिकागो में दिए गए व्याख्यान (1893) से एक अभियान की शुरुआत हुई जो सुधार के उद्देश्य से भारत की सदियों पुरानी परंपरा की व्याख्या करता है। इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में लगभग दो वर्ष व्यतीत किए, जहां 1894 में पहली ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की। उन्होंने पूरे यूरोप का व्यापक भ्रमण किया तथा ख्यात जर्मन दार्शनिक मैक्स मूलर और पॉल डूसन से संवाद किया। भारत में अपने सुधारवादी अभियान से पहले उन्होंने निकोला टेस्ला जैसे प्रख्यात वैज्ञानिकों के साथ तर्क-वितर्क भी किए।
धर्मनिरपेक्षता पर ये थे विचार
विवेकानंद का विचार है कि सभी धर्म एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं, यह उनके आध्यात्मिक गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक प्रयोगों पर आधारित है। परमहंस रहस्यवाद के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखते हैं, जिनके आध्यात्मिक अभ्यासों में यह विश्वास निहित है कि सगुण और निर्गुण की अवधारणा के साथ ही ईसाईयत और इस्लाम के आध्यात्मिक अभ्यास आदि सभी एक ही बोध या जागृति की ओर ले जाते हैं।
शिकागो प्रवास के तीन पहलू
शिकागो प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर बल दिया। पहला, उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा न केवल सहिष्णुता बल्कि सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करने में विश्वास रखती है।
दूसरा, उन्होंने स्पष्ट और मुखर शब्दों में इस बात पर बल दिया कि बौद्ध धर्म के बिना हिंदू धर्म और हिंदू धर्म के बिना बौद्ध धर्मं अपूर्ण है।
तीसरा, यदि कोई व्यक्ति केवल अपने धर्म के अनन्य अस्तित्व और दूसरों के धर्म के विनाश का स्वप्न रखता है तो मैं ह्रदय की अतल गहराइयों से उसे दया भाव से देखता हूं और उसे इंगित करता हूं कि विरोध के बावजूद प्रत्येक धर्म के झंडे पर जल्द ही संघर्ष के बदले सहयोग, विनाश के बदले सम्मिलन और मतभेद के बजाय सद्भाव व शांति का संदेश लिखा होगा।
महिलाओं की स्थिति सुधारने पर जोर दिया
स्वामी विवेकानंद ने आयरिश शिक्षिका मार्गरेट नोबल, जिन्हें उन्होंने 'सिस्टर निवेदिता' का नाम दिया था, को भारत आमंत्रित किया ताकि वे भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने में सहयोग कर सकें।
दरिद्र नारायण शब्द का प्रयोग
विवेकानंद ने आधुनिक भारत के निर्माताओं पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। इन नेताओं में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस शामिल थे। महात्मा गांधी द्वारा शोषित लोगों को 'हरिजन' शब्द से संबोधित करने के वर्षों पहले विवेकानंद ने 'दरिद्र नारायण' शब्द का प्रयोग किया था, जिसका आशय था कि 'गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।' महात्मा गांधी ने स्वीकार किया था कि विवेकानंद को पढ़ने के बाद भारत के प्रति उनका प्रेम हजार गुना बढ़ गया।
युवाओं के लिए प्रेरक हैं विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का मानना है कि किसी भी राष्ट्र का युवा जागरूक और अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित हो, तो वह देश किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। युवाओं को सफलता के लिए समर्पण भाव को बढ़ाना होगा तथा भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिये तैयार रहना होगा, विवेकानंद युवाओं को आध्यात्मिक बल के साथ-साथ शारीरिक बल में वृद्धि करने के लिये भी प्रेरित करते हैं।
उनके इन्हीं नवीन विचारों और प्रेरक आह्वानों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए उनके जन्मदिवस को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ घोषित किया गया है। इस मौके पर देश में न केवल उन्हें याद किया जाता है, बल्कि शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाने वाले अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।