फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जर्मनी के इस गांव में बनी थी दुनिया की पहली मिसाइल, इलाके में अब भी बिखरे पड़े हैं रॉकेट के टुकड़े

Sun, 10 May 2020 03:57 PM IST
Rohit Ojha न्यूज डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
पेनमुंडे गांव में बनी थी पहली मिसाइल ( फाइल फोटो) - फोटो : Social media
विज्ञापन

युद्ध, ये एक शब्द अपने भीतर ना जाने इतिहास की कितनी भयावह कहानियां समेटे हुए है। युद्ध को जीतने के लिए तरह-तरह के हथियारों का अविष्कार हुआ। आज दुनिया में युद्ध लड़ने का तरीका बदल चुका है। पहले युद्ध लड़ने के लिए तीर-तलवार प्रमुख हथियार हुआ करते थे, फिर उनकी जगह बंदूकों और तोपों ने ले ली। लेकिन मौजूदा समय में युद्ध को मिसाइलों और रॉकेटों के जरिए लड़ा जा रहा है।

विज्ञापन


हर देश तरह-तरह की मिसाइलों को अपने हथियारों के जखीरे में जमा कर रहे हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर दुश्मन के दांत खट्टे किए जा सकें। भारत के पास भी, पास और दूर तक मार करने वाली कई तरह की मिसाइलें हैं।

हम आए दिन अखबारों पढ़ते हैं कि इस देश ने इतनी ताकतवर मिसाइल टेस्ट की। कोई देश दुश्मन देश पर मिसाइल से वार करने की तैयारी में है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में मिसाइल और रॉकेटों द्वारा युद्ध लड़ने की कल्पना सबसे पहले किस देश ने की थी।
विज्ञापन


दरअसल, जर्मनी वो देश है, जिसने दुनिया में सबसे पहले युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने के बारे में सोचा था। वर्तमान में रूस और अमेरिका ने जर्मनी को मिसाइलों की दौड़ में बहुत पीछे छोड़ दिया है, लेकिन मिसाइलों से युद्ध में तबाही में मचाने का ख्याल सबसे पहले जर्मनी को ही आया था।

जर्मनी खुद कभी मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं कर सका
बाद में जर्मन वैज्ञानिकों ने रूस और अमेरिका में मिसाइलों के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। हालांकि यह बात और है कि जर्मनी खुद कभी मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं कर सका। बात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की है। जर्मनी के एक एक गांव को मिसाइल फैक्ट्री के तौर पर विकसित किया गया था।

इस गांव का नाम है, पेनमुंडे। ये गांव जर्मनी के यूसडम द्वीप में पेन नदी के मुहाने पर स्थित है। पेन नदी, यहां पर आकर बाल्टिक सागर में गिरती है। यूसडम द्वीप यूं तो अपने शानदार बीच और मछली से बने सैंडविच के लिए मशहूर है। नाजी सरकार ने 1936 से 1945 तक पेनमुंडे गांव को अपने बेहद खुफिया मिशन का अड्डा बनाया था। 

विज्ञापन

पहली क्रूज मिसाइल बनाने की फैक्टरी

जर्मन इंजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन ने 1935 में पेनमुंडे गांव को अपने मिसाइल कारखाने के लिए चुना था। उन्होंने इस गांव को इसलिए चुना क्योंकि यहां के आसपास का चार सौ किलोमीटर का इलाका पूरी तरह से सुनसान था। 

सरकार की मंजूरी के बाद यहां मिसाइल का कारखाना और टेस्टिंग रेंज स्थापित करने का काम बड़ी तेजी से हुआ। करीब 12 हजार लोगों ने यहां दिन-रात काम करके दुनिया की पहली क्रूज मिसाइल बनाने की फैक्ट्री और टेस्टिंग रेंज को तैयार किया था। रॉकेट तकनीक से ही इंसान ने अंतरिक्ष का सफर शुरू किया क्रूज मिसाइल बनाने की यह फैक्टरी 25 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली थी।

जर्मन सेना की बैलिस्टिक्स एंड मुनेशंस ब्रांच के प्रमुख रहे वाल्टर डॉर्नबर्गर ने 1942 में लिखा था, जिसमें वॉल्टर ने जर्मनी के रॉकेटर एग्रीगेट 4 (A-4) के कामयाब परीक्षण का जिक्र किया था। ये दुनिया का पहला लंबी दूरी तक मार करने वाला रॉकेट था।

इसका दूसरा नाम 'वेंजियंस वेपन' या बदला लेने वाला हथियार था। इस रॉकेट के परीक्षण के बाद वॉल्टर डॉर्नबर्गर और वर्नहर वॉन ब्रॉन जैसे वैज्ञानिक ये मानते थे कि इसकी मदद से वो दूसरा विश्व युद्ध आसानी से जीत सकते थे। मगर जर्मनी के तानाशाह हिटलर को इस पर यकीन नहीं था। इसलिए, जर्मनी की सरकार ने रॉकेट के सफल परीक्षण को ज्यादा महत्व नहीं दिया था।

उजड़ चुका है पूरा गांव

1943 में यहूदी युद्धबंदियों को इस कारखाने में काम पर लगाया गया। ये युद्धबंदी यूरोप के अलग-अलग देशों से लाए गए थे। इसी दौरान ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को भी पेनमुंडे के इस खुफिया रॉकेट कारखाने की भनक लग गई।

17 अगस्त, 1943 को ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स ने उस वक्त का सबसे बड़ा हवाई हमला पेनमुंडे पर किया। हालांकि ये हमला नाकाम रहा, लेकिन इससे हिटलर की सेना का मिसाइल निर्माण का अभियान धीमा पड़ गया। फिर कारखाने को पेनमुंडे से हटाकर मध्य जर्मनी के मिटेलवर्क ले जाया गया।

पेनमुंडे में हुए शोध की बुनियाद पर आगे चलकर इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें विकसित की गईं। इन्हीं की मदद से अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए रॉकेट बनाए गए। शीत युद्ध के दौरान इस तकनीक को बेहतर बनाने पर काफी काम हुआ। 

वर्तमान समय में पेनमुंडे गांव पूरी तरह से उजड़ हो चुका है। यहां बस एक लाल रंग का पॉवर स्टेशन ही बचा है, जिसमें पेनमुंडे हिस्टोरिकल टेक्निकल म्यूजियम स्थापित किया गया है। पूरे इलाके में रॉकेट के टुकड़े, पतवार, इंजन और दूसरे सामान बिखरे पड़े हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें