हिमाचल प्रदेश में प्रियंका गांधी
- फोटो : अमर उजाला
गुजरात में प्रचंड जीत के बावजूद पहले दिल्ली नगर निगम और अब हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार ने मिशन 2024 के लिए विपक्ष की उम्मीदों को जिंदा रखा है। हालांकि विपक्ष की एकता की राह में फिलहाल कांटे ही कांटे नजर आ रहे हैं। विपक्ष के लिए नेतृत्व का सवाल अब भी यक्ष प्रश्न है और गुजरात में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन ने इस गुत्थी को और उलझा दिया है।
दो राज्यों के विधानसभा चुनाव और उपचुनावों के नतीजे को विपक्ष के लिए बड़ा झटका नहीं है। गुजरात में भाजपा की प्रचंड जीत हिमाचल और दिल्ली में उसकी हार ने एक राजनीतिक संतुलन की स्थिति तैयार की है। हिमाचल में भाजपा की हार को यह कह कर कम करके नहीं आंका जा सकता कि यहां हर चुनाव में सरकार बदलने की परंपरा रही है। वह इसलिए कि यह न सिर्फ भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा का गृह राज्य था, बल्कि हाल ही में केरल और उसके बाद उत्तराखंड में हर चुनाव में सरकार बदलने की परंपरा टूटी है। जहां तक उपचुनाव के नतीजे का सवाल है, तो इसे बिहार में नीतीश कुमार के लिए झटका माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में मामला एकतरह से टाई रहा है। इसके इतर ओडिशा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत हासिल कर विपक्ष ने अपनी साख बरकरार रखी है।
विपक्ष बीते आठ सालों से भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की नाकाम कोशिश करती रही है। इस बार भी इसके मजबूत आसार बनते नहीं दिख रहे। लगातार कमजोर होती कांग्रेस विपक्ष की अगुवाई का अपना दावा छोडऩा नहीं चाहती। दूसरी ओर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और के चंद्रशेखर राव गैरकांग्रेस-गैरभाजपा दलों को एकजुट करना चाहते हैं। भाजपा के खिलाफ एकजुट होने के बदले विपक्षी दल अपना अलग-अलग दांव चल रहे हैं। इन दांव के पीछे उनकी केंद्र की राजनीति की अगुवाई करने की महत्वाकांक्षा है। केजरीवाल विपक्षी एकता की मुहिम से लगातार दूरी बना कर चल रहे हैं। ममता, केसीआर, शरद पवार चाहते हैं कि कांग्रेस इस बार क्षेत्रीय दल के किसी नेता की अगुवाई में चुनाव लड़े। इसके उलट नीतीश की योजना पुराने समाजवादी दलों को एकजुट कर कांग्रेस और वाममोर्चा के सहारे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने की है।
चार साल बाद किसी राज्य की सत्ता में आने वाली कांग्रेस का जायका गुजरात में मिली शर्मनाक प्रदर्शन ने बिगाड़ दिया है। अगर हिमाचल में जीत के साथ ही कांग्रेस गुजरात में बेहतर प्रदर्शन करती तो उसके लिए एक सकारात्मक धारणा बनती। खासतौर से आप की बढ़ रही घुसपैठ ने उसकी न सिर्फ चिंता बढ़ाई है, बल्कि भविष्य में विपक्षी एकता की अगुवाई के दावे को भी कमजोर किया है।