उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा नकदी मामले में न्यायपालिका पर फिर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा, एक न्यायाधीश के आवास पर जली हुई नकदी मिली, पर अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। क्या हम कानून के शासन का पालन कर रहे हैं? न्यायपालिका को जांच से बाहर रखना, उसे निरीक्षण से दूर रखना, यह किसी संस्था को कमजोर करने का सबसे आसान तरीका है। हर संस्था को जवाबदेह और कानूनी प्रक्रिया के अधीन होना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने एक कार्यक्रम में पूछा, जस्टिस वर्मा के घर से मिली नकदी का स्रोत क्या है और उसका मकसद क्या था? क्या इसने न्यायिक प्रणाली को प्रदूषित किया? आखिर इस मामले में बड़ी मछली कौन है? उपराष्ट्रपति ने कहा, मजबूत न्यायिक व्यवस्था लोकतंत्र के अस्तित्व और उसकी समृद्धि के लिए अनिवार्य है। यदि कोई एक घटना इसे कलंकित करती है, तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम जल्द से जल्द सच सामने लाएं।
उपराष्ट्रपति ने जांच समिति पर भी उठाए सवाल
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा नकदी मामले में जांच के लिए गठित समिति पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को, जिनके क्षेत्र में दो राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश आते हैं, एक ऐसी जांच में लगाया गया, जिसका कोई सांविधानिक आधार या वैधानिक वैधता नहीं है।
द कॉन्सिट्यूशन वी अडॉप्टेड (विद आर्टवर्क) पुस्तक के विमोचन के अवसर पर उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा, यदि इस जांच में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए, तो यह और भी गंभीर मुद्दा है। मामले की वैज्ञानिक आपराधिक जांच जरूरी थी। उन्होंने कहा, देश में जांच कार्यपालिका का कार्य है और न्यायिक निर्णय न्यायपालिका का क्षेत्र। एक न्यायाधीश को हटाने के लिए समिति केवल संसद सदस्यों के प्रस्ताव के जरिये लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति की ओर से ही गठित की जा सकती है। उपराष्ट्रपति ने पूछा, ऐसा क्यों हुआ कि इस मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली को उस तरह से क्रियान्वित नहीं किया, जैसा हर दूसरे व्यक्ति के लिए किया जाना चाहिए था?
क्या है मामला?
कथित नकदी की बरामदगी 14 मार्च को रात करीब 11.35 बजे जस्टिस वर्मा के लुटियंस दिल्ली स्थित आवास में आग लगने के बाद हुई थी। 22 मार्च को सीजेआई ने आरोपों की आंतरिक जांच करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था और घटना में दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय की जांच रिपोर्ट अपलोड करने का फैसला किया। इसमें कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने की तस्वीरें और वीडियो शामिल थे। हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा ने आरोपों को खारिज कर दिया था और कहा कि उनके या उनके परिवार के किसी सदस्य द्वारा स्टोररूम में कभी भी कोई नकदी नहीं रखी गई।
वीरास्वामी फैसले पर हो पुनर्विचार
धनखड़ ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के 1991 में आए के वीरास्वामी फैसले पर फिर से विचार करने का वक्त आ गया है, जिसमें कहा गया था कि शीर्ष अदालत व हाईकोर्ट के जजों पर मुकदमा चलाने के लिए पूर्व अनुमति की जरूरत होगी। इस फैसले ने जवाबदेही और पारदर्शिता की हर कोशिश को निष्प्रभावी करते हुए, दंडमुक्ति का ढांचा खड़ा कर दिया। अब समय आ गया है कि इसमें बदलाव हो। मुझे भरोसा है कि मौजूदा सुप्रीम कोर्ट, जो प्रतिष्ठित, ईमानदार लोगों से बना है, यह बदलाव करेगा। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश ने बहुत कम समय में ऐसा भरोसा जगाया है, जिससे आम जनता को राहत महसूस हो रही है।
प्रोटोकॉल का मुद्दा उठाने के लिए सीजेआई का आभार...मैं खुद भी इसका पीड़ित हूं
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सीजेआई जस्टिस बीआर गवई के मुंबई में प्रोटोकाॅल का मुद्दा उठाने का समर्थन किया। कहा, यह बहुत जरूरी मुद्दा है। हमें प्रोटोकॉल में विश्वास रखना चाहिए, इसका पालन करना मौलिक है। उन्होंने कहा, मैं इस मुद्दे को उठाने के लिए सीजेआई का आभार व्यक्त करता हूं। मैं भी इसका पीड़ित हूं। आपने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की तस्वीर देखीं होगी, लेकिन उपराष्ट्रपति की नहीं।