अमर उजाला शब्द सम्मान समारोह में गिरीश कर्नाड ने कहा था कि मैं भाग्यशाली रहा कि विविध भाषा संस्कृति में पला-बढ़ा। यही कारण है कि मैं अच्छी हिंदी बोल सकता हूं। मैं कवि बनना चाहता था। मेरी थियेटर में भी रुचि थी, लेकिन मेरा नाटक लेखक बनने का कोई इरादा नहीं था। स्कॉलरशिप मिलने के बाद मैं लंदन पहुंचा। उस समय एक धारणा थी कि यदि मैं विदेश जाउंगा, तो मैं विदेश की किसी गोरी मेम से शादी कर लूंगा। तभी एक दिन मेरे मन में ययाति लिखने का विचार आया। इसके बाद जिंदगी में कई मोड़ आए।
उन्होंने कहा था कि नाटकों के लेखन-निर्देशन, अभिनय के अलावा फिल्म निर्देशन में भी आया। जादूगरी में भी मेरी दिलचस्पी थी। जादू के शो चाव से देखता था। लेकिन जादू नहीं कर पाया। फिर मैंने मुंबई छोड़ा और वापस आ गया, क्योंकि मेरी पत्नी कहती थी कि बहुत हो गया हिंदी सिनेमा। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे आज भी ऑफर आते हैं। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज नाटक था। आज भी है। फिल्मों से पैसा कमाया। कभी आत्मसंतुष्टि नहीं हुई। मेरे सभी नाटक कन्नड़ भाषा में हैं। हिंदी और कन्नड़ ने मुझे बनाए रखा है।