पिछले कुछ वर्षों में सरकारों ने रेप के मामलों में कानून तो लगातार सख्त किया है, लेकिन देश में ऐसे मामलों में जांच और ट्रायल की लचर प्रक्रिया की वजह से बहुत कम ही मामलों में गुनहगार सलाखों के पीछे पहुंच पाते हैं। ऐसे केस में दोष सिद्धि की पिछले दशकों की तुलना में अब घटकर सिर्फ 25 फीसदी के आसपास ही रह गई है।
वर्ष दोष सिद्धि की दर
1973 44.3 फीसदी
1983 37.7 फीसदी
2009 26.9 फीसदी
2001 40.8 फीसदी
2010 26.6 फीसदी
2011 26.4 फीसदी
2012 24.4 फीसदी
2013 27.1 फीसदी
2016 25.5 फीसदी
2012 : रेप के मामलों में राज्यों में दोष सिद्धि की दर
मिजोरम 82.4 फीसदी
नगालैंड 72.1 फीसदी
सिक्किम 50 फीसदी
मेघालय 46.7 फीसदी
यूपी 50.3 फीसदी
उत्तराखंड 63 फीसदी
जम्मू-कश्मीर 7.5 फीसदी
गोवा 8.3 फीसदी
अरुणाचल प्रदेश 10 फीसदी
पश्चिम बंगाल 10.9 फीसदी
आंध्र प्रदेश 11.2 फीसदी
त्रिपुरा 14.7 फीसदी
तमिलनाडु 20.1 फीसदी
ओडिशा 21.3 फीसदी
(नोट : इसी साल दिल्ली में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामला हुआ था।)
कुछ देशों से ज्यादा है दोष सिद्धि की दर
देश में रेप के मामलों में दोष सिद्धि की दर कुछ विकसित देशों से ज्यादा है। ब्रिटेन में 2011-12 में 7 फीसदी, स्वीडन में 10 फीसदी और फ्रांस में 25 फीसदी रेप के मामलों में ही आरोपियों का दोष साबित हो पाया था।
चार राज्य दे चुके हैं बच्चियों से रेप पर मौत की सजा को मंजूरी
केंद्रीय कैबिनेट के अध्यादेश लाए जाने से पहले ही चार राज्य 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से रेप के मामले में फांसी का प्रावधान कर चुके हैं। राजस्थान सरकार ने मार्च, 2018 में बच्चियों से दुष्कर्म में मौत की सजा के कानून को मंजूरी दी थी। मध्य प्रदेश ऐसा कानून बनाने वाला पहला राज्य है। हरियाणा में भी इससे जुड़े प्रावधान को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अरुणाचल प्रदेश सरकार भी मार्च, 2018 में ऐसे मामलों में मौत की सजा को मंजूरी दे चुकी है। वहीं, महाराष्ट्र और कर्नाटक की सरकारें ऐसे मामलों में मौत की सजा पर विचार कर रही हैं।