राष्ट्रपति उम्मीदवार की कवायद के वक्त वेंकैया नायडू ने यह कहते हुए मीडिया की अटकलों को खारिज किया था कि वे उषापति बनकर खुश हैं। राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति पद की उनमें लालसा नहीं है। मगर भाजपा ने इस उषापति को उपराष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया है। दरअसल नायडू की पत्नि का नाम उषा है। भाजपा की सर्वोच्च संस्था संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद नायडू की उम्मीदवारी का ऐलान करते हुए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि वेंकैया नायडू उपराष्ट्रपति पद के लिए राजग के उम्मीदवार होंगे। उनकी उम्मीदवारी का सभी राजग दलों ने स्वागत किया है।
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भाजपा संसदीय बोड ने सर्वसम्मति से नायडू को उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया है। वे राजग के उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार होंगे। नायडू के नेतृृत्व की तारीफ करते हुए शाह ने कहा कि एक किसान परिवार में जन्म लेने वाले नायडू भाजपा के सभी पदों पर रहे हैं। वे सत्तर के दशक से सक्रिय राजनीति में हैं। करीब 25 वार्षों से वे संसद के सदस्य हैं। सोमवार शाम को पीएम मोदी की मौजूदगी और अमित शाह की अध्यक्षता में करीब एक घंटे तक भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक हुई। बैठक में नायडू की उम्मीदवारी के नाम पर अंतिम मुहर लगाई गई। इस पद पर उनका मुकाबला विपक्ष के उम्मीदवार गोपाल गांधी से होगा।
मंगलवार 18 जुलाई को नामांकन के अंतिम दिन पर्चा दाखिल करेंगे नायडू
18 जुलाई मंगलावार को उपराष्ट्रपति पद के लिए नामांकन का अंतिम दिन है। नामांकन के अंतिम दिन से एक दिन पूर्व भाजपा ने अपने उम्मीदवार के चेहरे से परदा हटाया है। अब मंगलवार को पीएम मोदी समेत तमाम नेताओं की मौजूदगी में नायडू सुबह 11 बजे अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। वैसे सोमवार को भाजपा ने उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के नामांकन पत्र पर समर्थकों का हस्ताक्षर करवाने का कार्य शुरू कर दिया था। राष्ट्रपति का वोट डालकर संसद भवन स्थित पार्टी कार्यालय में आकर कई सांसद नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर करते दिखे।
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संसदीय अनुभव और दक्षिण का होना रहा नायडू के पक्ष में
राष्ट्रपति पद के लिए राम नाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से यह तय माना जा रहा था कि भाजपा दक्षिण भारत के किसी नेता को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाएगी। इस पद के लिए नायडू के अलावा विधा सागर राव और केंद्रीय राज्य मंत्री निर्मला सितारमन के नाम भी चर्चा में रहे। मगर दक्षिण भारत की राजनीति में बडा चेहरा होने के साथ नायडू के संबंध लगभग सभी दलों के नेताओं संग बेहत्तर हैं। 68 वर्षिय नायडू का जन्म1 जुलाई 1949 को आंध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले में हुआ।
वे अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रह चूके हैं। दक्षिण भारतीय होने के अलावा नायडू का संसदीय अनुभव बेहद गहरा है। अटल बिहारी वाजपेई, लाल कृृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के बाद भाजपा संगठन की लिहाज से वे अहम चेहरा रहे हैं। संघ से जुडने के बाद अखिल भारतीय विधार्थी परिषद, भाजपा यूवा मोर्चा, आंध्र भाजपा अध्यक्ष के अलावा वे केंद्रीय भाजपा में राष्ट्रीय प्रवक्कता, महासचिव से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद का निर्वाह कर चूके हैं।
बड़े नेताओं ने पहले ही दे दी थी नायडू को बधाई
उपराष्ट्रपति पद के लिए नायडू के नाम का औपचारिक ऐलान पार्टी ने बेशक सोमवार शाम को किया है। मगर पक्ष—विपक्ष के नेताओं के जरिए उन्हें बधाई देने का सिलसिला सोमवार से शुरू हो गया था। सोमवार को जब नायडू संसद भवन में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मत डालने गए तब उन्हें वहां कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद, वाम दल के सिताराम येचूरी समेत सत्तापक्ष और विपक्ष के कई नेताओं ने बधाई दिया।
इसपर नायडू बात बनाकर स्पष्ट बधाई स्वीकारने से बचते रहे। मीडिया के लोगों ने भी नायडू से मिलकर उन्हें बधाई देने का प्रयास किया। तब भी कुछ औपचारिक कहने के बजाय नायडू ने शाम को होने वाली पार्टी संसदीय दल की बैठक का इंतजार करने को कहा। लेकिन सूत्र बताते हैं कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार शाम को उनसे मुलाकात कर उन्हें उपराष्ट्रपति बनाए जाने के निर्णय की जानकारी दी। इसके बाद सोमवार सुबह नायडू की मुलाकात पीएम मोदी से हुई।
पीएम ने उन्हें कहा कि वे अभी सक्रिय राजनीति में कार्य करना चाहते हैं। इसपर पीएम ने कहा कि सरकार में भी टैंलेंट की जरूरत है। यह स्वाभाविक है कि सरकार से बाहर जाने में अनुभव के चेहरों की कमी खलेगी। मगर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद पर भी बेहत्तर लोगों की जरूरत है। भारत को आगे बढाने के लिए इन दोनों संवैधानिक पदों पर भी बेहत्तर चेहरों की आवश्यक्ता है।
मंत्री बनना वेंकैया के लिए रहा है लक्की
केंद्र सरकार में मंत्री बनना वेंकैया नायडू के लिए बेहद लक्की रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जब वे ग्रामीण विकास मंत्री थे। तब नायडू को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का मौका मिला। जेना कृृष्णमूर्ती के बाद वे भाजपा के अध्यक्ष बने। अब जब वे राजग टू यानी पीएम मोदी की सरकार में शहरी विकास मंत्री हैं तो उन्हें उपराष्ट्रपति बनने का मौका मिला है। पिता के उपराष्ट्रपति बनने की सूचना पाते ही नायडू की बेटी ने उन्हें याद दिलाया कि ग्रामीण विकास मंत्री के पद से इस्तीफा देकर वे पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और अब शहरी विकास मंत्री से इस्तीफा देकर उपराष्ट्रपति बन रहे हैं।
कबड्डी के लगाव ने बनाया संघ से जुड़ाव
वेंकैया के करीबियों की मानें तो नायडू की कबड्डी और खो—खो के खेल में बचपन से गहरी रूची थी। कबड्डी से लगाव के चलते वे वर्ष 1963 में संघ से जुडे। उसके बाद वे भगवा परिवार की राजनीति में बडा चेहरा बन गए। संघ में जग्गनाथ राव जोशी उनके प्रिय अधिकारी रहे। उनकी देखरेख में ही नायडू ने राजनीति की सीढ़ी चढ़ी।
कुछ यूं रहा नेल्लोर से लूटियन दिल्ली तक नायडू का सफर
वेंकैया नायडु
वर्ष 1963 में संघ की शाखा से जुडने के बाद नायडू 1967 में संघ की छात्र वींग एबीवीपी के प्रदेश सचिव बने। उसके बाद वे एबीवीपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे। यहां जग्गनाथ राव जोशी से उन्होंने भाषण देने की कला सीखी। विधार्थी परिषद के बाद नायडू ने जनसंघ की राजनीति में अपना कदम रखा। 1973 में वे जनसंघ से जुडे। जेपी आंदोलन के वक्त आंदोलन में सक्रिया भागीदारी के जरिए वे जेपी की नजरों में भी आए।
नायडू को हमेसा से अटल बिहारी वाजपेई का चेहरा आकर्षक लगा है। लेकिन उनपर वैचारिक प्रभाव लाल कृृष्ण आडवाणी का है। पीएम मोदी के भी वे बेहद खास माने जाते हैं। टीम आडवाणी के रूप में नायडू ऐसे नेता रहे हैं जोकि सबसे पहले नरेंद्र मोदी से जुडे। पीएम मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब ही नायडू उनके पक्ष में खुलकर साथ आ गए थे।
नायडू कहते भी हैं कि पीएम मोदी ऐसी शख्सियत हैं जिसने राजनीति की सभी मापदंडो को धराशायी किया है। 1978 और 1983 में नेल्लूर जिले के उदयगीरी सीट से चुनाव जीतकर नायडू दो बार आंध्र विधानसभा के सदश्य रहे हैं। इसके बाद उन्होंने कोई सीधा चुनाव नहीं लडा। हर जिले में एक युवा उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारने की जेपी की रणनीति के वजह से नायडू को 1978 में जनसंघ का टिकट मिला। तब जिले की सभी 11 विधानसभा सीटों में से 10 पर कांग्रेस की जीत हुई थी। इंदिरा गांधी के चुनाव प्रचार में जाने के बाद भी नायडू अपनी सीट जीतने में कामयाब रहे थे।
इसके बाद 1978 में उनका चुनावी जहाज एनटी रामाराव की आंधी में फंसता दिखा। मगर इसमें भी वे अपनी नैय्या पार लगाने में कामयाब रहे थे। इस बार जिले की 11 में से 10 सीटों पर एनटीआर के दल को जीत मिली थी।
स्थानीय लोगों का भटकाव भी नहीं रोक पाया संघ से जुड़ाव
वेंकैया यह बात अक्सर कहते हैं कि जब वे संघ से जुडे तो स्थानिय लोगों ने उन्हें काफी बरगलाया कि आरएसएस में जुडने से मांशाहारी भोजन त्यागना पडेगा। मगर नायडू सीधे तब के प्रांत प्रचारक सोमैया गारू से जाकर मिले। सोमैया ने उन्हें समझाया कि संघ में ऐसी कोई परंपरा नहीं है।
मांशाहारी खाने की रोक नहीं है। सुविधा के लिए शाकाहारी भोजन पर जोर दिया जाता है। तब जाकर नायडू के मन से शाकाहारी—मांशाहारी का संशय दूर हुआ। ऐसा ही वाक्या उनके साथ तब हुआ जब वे जनसंघ की राजनीति से जुडे। राजनीति के दोस्त यार उन्हें तरह—तरह के ताने मारते थे कि यह उत्तर भारत, ब्राहण—बनिया और पढे लिखों की पार्टी है। लेकिन अटल के प्रति लगाव रखने वाले नायडू का मन नहीं बिचला। बाद में जनसंघ की सफलता के बाद वही नेता उनकी तारीफ करने लगे।
नायडू का संयोग उनके नेतृृत्व में कार्य कर चूके हैं पीएम मोदी और कोविंद
- फोटो : PTI
यह संयोग की है कि नायडू के नेतृृत्व में राष्ट्रपति होने जा रहे राम नाथ कोविंद और खुद पीएम मोदी कार्य कर चूके हैं। नायडू जब भाजपा अध्यक्ष थे तब उन्होंने कोविंद को भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे का अध्यक्ष बनाया था और पीएम मोदी भी उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष के नेतृृत्व में राष्ट्रीय सचिव रह चूके हैं। नायडू की मोदी से पहली मुलाकात भी तब हुई जब वे राष्ट्रीय महामंत्री के नाते गुजरात गए थे। तब मोदी गुजरात भाजपा में संगठन महासचिव के पद पर थे। भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री के अलावा नायडू पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, प्रवक्ता, प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश महासचिव, युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रदेश युवा मोर्चा के अध्यक्ष रह चूके हैं। लंबे समय से वे राज्यसभा के सदस्य हैं।
भाजपा ने कराया उत्तर—दक्षिण का संगम
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद पर उम्मीदवार चयन के मामले में भाजपा ने पूरी तरह 2019 के चुनावी समीकरण को ध्यान में रखा है। राष्ट्रपति के लिए कोविंद के रूप में यूपी का दलित चेहरा चुनने के बाद भाजपा ने उपराष्ट्रपति के लिए नायडू के नाम को आगे कर उत्तर—दक्षिण के चेहरों का संगम कराया है।
पोते के लिए टीवी दादा हैं नायडू
उपराष्ट्रपति बनने जा रहे वेंकैया नायडू बेशक देश की राजनीति में बडे चेहरा हैं। मगर अपने पोते के लिए वे टीवी दादा हैं। नायडू के परिवारिक पृृष्ठभूमि पर नजर दौडाएं तो वे किसान परिवार से आते हैं। उनके परिवार में अभी पत्नि उषा के अलावा एक बेटी और एक बेटा है। बेटी और बेटे दोनों की शादी हो चूकी है। बेटे और दामाद दोनों का ही अपना अलग—अलग व्यवसाय है।
वे राजनीति से दूर रहते हैं। हालांकि नायडू का बेटा बेहद गंभीर स्वभाव का है। पिता से बातचीत में झीझक रहती है जबकि बेटी उनपर हावी हैं। कपडे पहनने के चयन से लेकर घर के साज—सज्जा का निर्णय बेटी के हाथों में है। हालांकि नायडू का पोता बेहद बोल्ड है उन्हें वह अक्सर टीवी दादा कहके पुकारता है। क्योंकि नायडू हमेसा पार्टी और सरकार का पक्ष रखने के लिए टीवी और मीडिया से सक्रियता बनाए रखते हैं। इससे पहले उनकी बेटी अक्सर यह ताना मारा करती थी कि वेंकैया जी हमारे घर भी आए हैं। क्योंकि पार्टी कार्यक्रमों की वजह से नायडू अक्सर प्रवास पर रहते थे।
नायडू पर ईश्वर की भी मेहराबनी गजब की रही है। हेलिकाप्टर और हवाई यात्रा के दौरान 9 बार उनके साथ हादशे हुए हैं। जिसमें जान बच पाना संभव नहीं। बावजूद नायडू हमेसा इन हादशों पर भारी रहे हैं। कई बार उन्होंने अपने हादशों की चर्चा मीडिया से अनौपचारिक चर्चा के दौरान की है।
अटैची उठाना महामंत्री का जिम्मा
नायडू में संगठन क्षमता बेजोड रही है। तूकबंदी के जरिए विपक्ष पर हमला बोलने की उनकी शैली को उत्तर भारत में भी खुब सराहना मिलती रही है। मगर नायडू में संगठन की भी अपार क्षमता रही है। कुशाभाउ ठाकरे के अध्यक्ष कार्यकाल में बतौर राष्ट्रीय महामंत्री नायडू ने देश के सभी जिलों में संगठन की बैठक की। उन बैठकों में वे अक्सर कुशाभाउ से पहले पहुंचकर अपना भाषण देते थे। तब नायडू कहते थे कि महामंत्री का कार्य अध्यक्ष की अटैची ढोना है। वे इस कार्य को कर रहे हैं। उनकी यह शैली कार्यकर्ताओं में बेहद अपील करती थी। केंद्रीय भाजपा में मुख्त्तार अब्बास नकवी, राजीव प्रताप रूढी, सिदार्थ नाथ सिंह, नलीन कोहली और रामेश्वर चौरसिया सरीखे कई चेहरे हैं जिन्हें नायडू ने भाजपा की राजनीति में आगे बढाया है।
राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति के लिए भी वोट गणित भाजपा के पक्ष में
राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए भी वोट का गणित भाजपा के पक्ष में है। उपराष्ट्रपति पद के लिए लोकसभा और राज्यसभा के सदश्य वोट डालते हैं। दोनों सदनों की कुल संख्या 790 में से 786 सांसद वोट करेंगे। इसमें भाजपा को करीब 520 वोट मिलने का अनुमान है। राज्यसभा की संख्या245 है और लोकसभा के सदस्यों की संख्या 545 है। अनिल माधव दवे के निधन और अन्य कारणों से राज्यसभा में दो सदश्य की संख्या रिक्त है।
यही आलम लोकसभा में भी है यहां भी दो सदश्यों की संख्या रिक्त है। संख्या बल पर गौर करें तो अकेले लोकसभा में ही राजग सदश्यों की संख्या 338 है। जबकि यूपीए की संख्या 49 है शेष 144 सदश्य दोनों दलों से दूरी बनाए हुए हैं। इनमें से कुछ यूपीए तो कुछ राजग उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालेंगे। राज्यसभा में सरकार की संख्या कम है। लेकिन न्यूट्रल रहने वाले दलों को साधकर सरकार के उम्मीदवार की जीत भारी अंतर से तय है। यहां राजग की संख्या 74 है। तो राज्यसभा में विपक्षी सदश्यों की संख्या 171 हैं जिसमें यूपीए के सदश्यों की संख्या 64 है। इनमें न्यूट्रल दलों के सदश्यों की संख्या करीब76 बताई जा रही है।