कोई सियासी गठबंधन अपनी अंतर्कलह से बेमौत कैसे मरता है। इसका ताजा उदाहरण इस समय बिहार में आकार ले रहा है। इस चर्चित महागठबंधन के तीनों घटक, यानी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और कांग्रेस, 'अटूट रिश्ता' वाले अपने ही दावे को दांव पर लगा चुके हैं।
लालू परिवार का कथित बेनामी संपत्ति घोटाला, जिसके एक अभियुक्त करार दिए गए उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का इस्तीफा चाहते हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। जद-यू यह प्रचारित कर रहा है कि उनके नेता नीतीश भ्रष्टाचार के मामले में अपने घोषित 'जीरो टॉलरेंस' और अपनी 'साफ छवि' पर आंच बर्दाश्त नहीं करेंगे।
समझ में नहीं आता कि चारा घोटाले के सजायाफ़्ता लालू प्रसाद के साथ सत्ताकामी गलबहियां करते समय उनकी छवि को आंच की जगह शीतल छाया कैसे मिली। कोई यह भी बताए कि आपराधिक छवि वाले एक नहीं, अनेक दाग़ियों को गले लगा चुके 'सुशासन बाबू' के प्रायोजित प्रचारक क्या कुशासन में कराह रहे बिहार के जले पर नमक नहीं छिड़क रहे। दूसरी बात कि बेनामी संपत्ति बटोरने के आरोपों में फंसे लालू परिवार को भी पता है कि ऐसे प्रत्यक्ष मामलों को सिर्फ़ सियासी मकसद वाली बदले की कार्रवाई बता कर बच निकलना अब नामुमकिन है।
फिर भी उनका यह सवाल बिलकुल वाजिब है कि बेशुमार बेनामी संपत्तियों को निगल चुकीं बड़ी-मछलियों पर महाजाल क्यों नहीं फेंक रही मोदी सरकार। इस बाबत नीतीश कुमार को लेकर लालू प्रसाद के होंठ पर लगा ताला अब खुलने को बेताब है। बस तेजस्वी की बर्ख़ास्तगी वाली धमकी के सच हो जाने का उन्हें इंतजार है।
दोनों पक्षों ने राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक अपने अंतिम फ़ैसले पर अमल रोकने की बात कही है। लेकिन 'प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न' जैसी सूरत बन जाने के बावजूद महागठबंधन और उसकी सत्ता बचाने के किसी चमत्कारिक समझौते की गुंजाइश अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं मानी जा रही है।
तेजस्वी का इस्तीफ़ा लेने और नहीं देने की ज़िद तोड़ने में कांग्रेस की कोशिशें नाकाम हुईं। ऐसा कहा जा रहा है। लेकिन कहा तो ये भी जा रहा है कि बिहार में यादव-मुस्लिम जनाधार के बूते फिर चुनाव में उतरने या इसी आधार पर जोड़-तोड़ करके कंग्रेस की मदद से सत्ता बचाने में जुटा है लालू ख़ेमा।