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नजरिया: लालू यादव के दिल में नीतीश नीति का शूल

Mon, 17 Jul 2017 06:57 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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कोई सियासी गठबंधन अपनी अंतर्कलह से बेमौत कैसे मरता है। इसका ताजा उदाहरण इस समय बिहार में आकार ले रहा है। इस चर्चित महागठबंधन के तीनों घटक, यानी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और कांग्रेस, 'अटूट रिश्ता' वाले अपने ही दावे को दांव पर लगा चुके हैं।
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लालू परिवार का कथित बेनामी संपत्ति घोटाला, जिसके एक अभियुक्त करार दिए गए उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का इस्तीफा चाहते हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। जद-यू यह प्रचारित कर रहा है कि उनके नेता नीतीश भ्रष्टाचार के मामले में अपने घोषित 'जीरो टॉलरेंस' और अपनी 'साफ छवि' पर आंच बर्दाश्त नहीं करेंगे।

समझ में नहीं आता कि चारा घोटाले के सजायाफ़्ता लालू प्रसाद के साथ सत्ताकामी गलबहियां करते समय उनकी छवि को आंच की जगह शीतल छाया कैसे मिली। कोई यह भी बताए कि आपराधिक छवि वाले एक नहीं, अनेक दाग़ियों को गले लगा चुके 'सुशासन बाबू' के प्रायोजित प्रचारक क्या कुशासन में कराह रहे बिहार के जले पर नमक नहीं छिड़क रहे। दूसरी बात कि बेनामी संपत्ति बटोरने के आरोपों में फंसे लालू परिवार को भी पता है कि ऐसे प्रत्यक्ष मामलों को सिर्फ़ सियासी मकसद वाली बदले की कार्रवाई बता कर बच निकलना अब नामुमकिन है।
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फिर भी उनका यह सवाल बिलकुल वाजिब है कि बेशुमार बेनामी संपत्तियों को निगल चुकीं बड़ी-मछलियों पर महाजाल क्यों नहीं फेंक रही मोदी सरकार। इस बाबत नीतीश कुमार को लेकर लालू प्रसाद के होंठ पर लगा ताला अब खुलने को बेताब है। बस तेजस्वी की बर्ख़ास्तगी वाली धमकी के सच हो जाने का उन्हें इंतजार है।

दोनों पक्षों ने राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक अपने अंतिम फ़ैसले पर अमल रोकने की बात कही है। लेकिन 'प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न' जैसी सूरत बन जाने के बावजूद महागठबंधन और उसकी सत्ता बचाने के किसी चमत्कारिक समझौते की गुंजाइश अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं मानी जा रही है।

तेजस्वी का इस्तीफ़ा लेने और नहीं देने की ज़िद तोड़ने में कांग्रेस की कोशिशें नाकाम हुईं। ऐसा कहा जा रहा है। लेकिन कहा तो ये भी जा रहा है कि बिहार में यादव-मुस्लिम जनाधार के बूते फिर चुनाव में उतरने या इसी आधार पर जोड़-तोड़ करके कंग्रेस की मदद से सत्ता बचाने में जुटा है लालू ख़ेमा।
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उधर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नीतीश कुमार को सत्ता-नेतृत्व में बनाए रखने के लिए तैयार बैठी है। महागठबंधन का टूटना उसकी पहली जरूरत है। हालांकि यह सब कबूल कर नीतीश अपनी 'सिद्धांतवादी या आदर्शवादी छवि' का खोखलापन कैसे ढंकेंगे नहीं पता।

हां, यह पता ज़रूर है कि भ्रष्टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस वाली बात महागठबंधन के इस संकट की मूल वजह नहीं है। जब नीतीश सरकार पर लालू परिवार के वर्चस्व वाला दबाव अचानक बढ़ गया था। तब नीतीश बुरी तरह चिढ़ गए थे। संयोग से उसी समय नोटबंदी का मामला आ गया।

केंद्र की मोदी सरकार को इसमें अप्रत्याशित समर्थन दे कर नीतीश कुमार ने लालू को पहला झटका दिया। यह झटका तब और गहरा गया। जब नीतीश ने नोटबंदी पर अपने पहले बयान में ही बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई की मांग उछाल दी। उन्हें पता था कि 'बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई' की बात सुनते ही लालू परिवार उनके सामने सरेंडर हो जाएगा।

लालू प्रसाद के दिल में नीतीश-नीति का शूल उसी दिन चुभ गया था। फिर तो लालू यादव को घुटने पर लाने के बहाने ढूंढे जाने लगे। सीबीआई के छापे और एफआईआर में तेजस्वी का नाम सबसे तगड़ा बहाना बना। अब अपने जिस बेटे को लालू अपनी राजनीतिक विरासत सौंपना चाहते हैं। उसी की जड़ काटने वाली नीतीश-नीति उन्हें कैसे क़बूल होगी। अब दोनों यानी छोटे भाई और बड़े भाई के इस आर-पार वाले सियासी खेल में दो पाटन के बीच पिस रहे बिहार में सरकार है।
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