सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है और संविधान के अनुच्छेद 32 (रिट याचिका) और 136 (विशेष अनुमति याचिका) के तहत दायर होने वाली याचिकाओं में समिति की रिपोर्ट को आधार बनाया जा सकता है, लेकिन उसकी वैधता पर न तो सवाल खड़ा किया जा सकता है और न ही उसे चुनौती दी जा सकती है। पांच जजों की संविधान पीठ ने आमराय से यह व्यवस्था दी, लेकिन तीन जजों ने अपनी अलग राय जाहिर की।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एके सिकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट को न्यायिक प्रक्रिया से अलग रखने का कोई कारण नहीं है और अदालत उन पर निर्भर कर सकती है।
पीठ ने कहा कि समिति की रिपोर्ट पर न्यायिक संज्ञान लेना संसदीय विशेषाधिकार पर अतिक्रमण नहीं है। हालांकि पीठ ने कहा कि संसदीय समिति की रिपोर्ट को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। फैसला चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यामयूर्ति डीवाई चंद्रचूंड और न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने अलग-अलग लिखा है लेकिन सभी का निष्कर्ष एक ही है।
फैसले में कहा गया है कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है और नागरिकों को उस पर पर टिप्पणी करने एवं प्रतिक्रिया देने का अधिकार है। न्यायिक प्रक्रिया में समिति की रिपोर्ट का हवाला देना संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं है। याचिकाओं में समिति की रिपोर्ट को साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि सबूत के तौर पर समिति की रिपोर्ट का हवाला देने का यह मतलब नहीं है कि वह सही साबित हो गया। समिति की रिपोर्ट पर उचित टिप्पणी करना अभिव्यक्ति के अधिकार के दायरे में है।