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सुलगते सवाल: दिलचस्प मोड़ पर उत्तराखंड चुनाव, कहां हैं पहाड़ के मुद्दे?

सार

उत्तराखंड राज्य प्राप्ति के पीछे लोगों की प्रबल इच्छा थी कि राज्य के लोगों का पलायन रुकेगा, जल, जंगल, जमीन पर उन्हें अधिकार मिलेगा और आम आदमी को रोजगार मिलेगा।
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उत्तराखंड के मुद्दे - फोटो : हिमांशु जोशी, उत्तराखंड
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विस्तार
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पंजाब, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, गोवा की तरह उत्तराखंड का विधानसभा चुनाव भी काफी दिलचस्प हो गया है। प्रत्येक राजनीतिक दल अपने घोषणापत्रों में पानी और बिजली निःशुल्क देने की बात कर रहे हैं। हालांकि समाज में बाल मजदूरी, महिला उत्पीड़न, प्राकृतिक संसाधनों से चलने वाली आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषयों पर जो मौलिक सोच चुनाव के समय उम्मीदवारों की तरफ से जनता के बीच जानी चाहिए, वह एक दूसरे को कोसने की राजनीति के कारण गायब हो जाती है।

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उत्तराखंड राज्य प्राप्ति के पीछे लोगों की प्रबल इच्छा थी कि राज्य के लोगों का पलायन रुकेगा, जल, जंगल, जमीन पर उन्हें अधिकार मिलेगा और आम आदमी को रोजगार मिलेगा। लेकिन ये सब बातें अब तक राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों के मजबूत हिस्से नहीं बन पाए हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा में जिस तरह से छोटे किसानों की जमीन, घर, जंगल, रास्ते, नदियां, पहाड़ बर्बाद हो रहे हैं, उनको बचाने के प्रयास भी कंपनियों के माध्यम से हो रहे हैं। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में आई आपदा से कोई भी सबक नहीं लिया जा रहा है। दलित, अल्पसंख्यक, विधवा, परिवारों को आपदा से उबरने के लिए पर्याप्त राशि नहीं मिल पाती है। 

उत्तराखंड में बाढ़, भूकंप, भूस्खलन की बार-बार होने वाली घटनाओं के बाद भी बड़े निर्माण, वनों का विनाश, बांधों का निर्माण, मलबों के ढेरों का निस्तारण जान-बूझकर ऐसे स्थानों पर हो रहा है, जो भू-गर्भशास्त्रियों के अनुसार संवेदनशील क्षेत्र हैं। ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण के बारे में राजनीतिक दलों के घोषणापत्र एक जैसे हैं। उन्होंने कभी भी पर्यावरण और विकास के बीच सृजनात्मक संबंध बनाने की बात नहीं कही है और न ही पर्यावरण को न्याय मिल पा रहा है। लेकिन इस बार राज्य विधानसभा के चुनाव में राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में एक नई बात दिखाई दे रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल 200-300 यूनिट बिजली निःशुल्क देने की बात कर रहे हैं और इसी तर्ज पर पानी भी लोगों को उपलब्ध करवाने की घोषणा कर रहे हैं। रसोई गैस की कीमत आधी करवाने के अलावा रोजगार देने का वादा भी ये पार्टियां कर रही हैं, लेकिन दूसरी ओर देखें, तो जल, जमीन, जंगल पर लोगों को अधिकार मिले, इस पर कुछ नहीं कहा जा रहा है। कमरतोड़ महंगाई को घटाने और पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं को रोजमर्रा के काम के बोझ से कैसे मुक्ति मिलेगी-इस पर घोषणापत्रों में स्पष्ट सोच का अभाव है।
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हिमालयी राज्यों से अलग हिमालय नीति की मांग की जा रही है, इस बारे में राष्ट्रीय दलों को अवश्य कुछ कहना चाहिए था। उत्तराखंड में हर वर्ष नौ सितंबर को हिमालय दिवस मनाया जा रहा है, जिसका प्रभाव गैर  सरकारी/सरकारी बैठकों से आगे नहीं पहुंच सका है। हिमालयी राज्यों में चुनाव जलवायु को ध्यान में रखकर किया जाए, तो जनवरी-फरवरी की कंपकंपाती सर्दी और बर्फ के बीच चुनाव प्रचार के अलावा मतदान केंद्रों पर जाने वाली पोलिंग टीमों को परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी और अधिक से अधिक मतदाता मतदान भी कर सकते हैं। 

उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद किसी भी राजनीतिक दल ने आम जन से मिलकर यह जानने की कोशिश नहीं की है कि वे कैसा उत्तराखंड चाहते हैं? किस तरह से लोगों का जीवन एवं जीविका सुरक्षित रह सकती है? कैसे राज्य के नौकरशाह, नेता मिलकर आम आदमी के द्वार पर जाकर उनकी समस्याओं को सुनें और समाधान करें? इस पर कोई राजनीतिक संस्कृति नहीं बनाई गई है। कई जनप्रतिनिधि अपनी विधायक निधि तक इस्तेमाल और सरकार की सभी योजनाओं की मॉनिटरिंग नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण भ्रष्टाचार की असीमित गुंजाइशें बढ़ जाती हैं। भ्रष्टाचार के चलते गुणवत्ता विहीन निर्माण के कारण देश की संपत्ति बर्बाद हो रही है। इसी तरह एपीएल और बीपीएल परिवारों का पुनर्सर्वेक्षण कराने की आवश्यकता है, जिस पर चुनाव के समय उम्मीदवारों को जनता के सामने अपनी बात रखनी चाहिए।
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(- लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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