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यूपी: शीला को लाने से ब्राह्मण कांग्रेस की ओर झुकेंगे?

Mon, 18 Jul 2016 06:33 PM IST
समीरात्मज मिश्र/लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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रोड शो - फोटो : amar ujala
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उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित को कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा के बाद एक बार फिर राज्य में ब्राह्मण वोट बैंक की चर्चा हो रही है। कभी कांग्रेस का समर्थक रहा यह वर्ग पिछले काफी समय से राजनीतिक नेतृत्व के लिहाज से हाशिए पर चला गया है।
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यही नहीं, राज्य में मतदाता के तौर पर भी एक समय इस वर्ग को महत्वहीन समझा जाने लगा था लेकिन बहुजन समाज पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग के बाद सभी राजनीतिक दल इस वर्ग को लुभाने में लगे हैं।

तिलक तराजू और तलवार जैसे नारों के साथ चुनावी समर में उतरने वाली बहुजन समाज पार्टी भी जब कुछ ही सालों में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ पर उतर आई तो इससे ब्राह्मण समुदाय में अपने राजनीतिक पुनरुत्थान की रोशनी दिखी।
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बसपा के इस प्रयोग को जबर्दस्त सफलता मिली और 2007 में उसने विधान सभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल किया। उसके बाद तो समाजवादी पार्टी समेत सभी राजनीतिक दलों ने अपने यहां ब्राह्मणों को महत्व देना शुरू किया।

भारतीय जनता पार्टी को तो पहले से ही ब्राह्मणों की पार्टी कहा जाता था। राजनीतिक दलों की ओर से इस वर्ग को महत्व तो मिलने लगा लेकिन इसके सामने अब भी नेतृत्व संकट बना हुआ था।

'पिछड़े समुदाय के तुष्टीकरण की कोशिश से नाराज ब्राह्मण वोटर'

सीएम उम्मीदवार बनने के बाद लखनऊ में शीला का रोड शो - फोटो : amar ujala
ऐसे में जब कांग्रेस पार्टी ने शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में आगे कर दिया है, तो राजनीतिक हल्कों में ये चर्चा शुरू हो गई है कि इस लिहाज से तो कांग्रेस ने बाजी मार ही ली है।

लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, “मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस से हटकर भाजपा की ओर आया। लेकिन पिछले कुछ समय से खासकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पार्टी में वर्चस्व बढ़ने के साथ, जिस तरह से पिछड़े समुदाय के तुष्टीकरण की कोशिश हो रही है, उससे ब्राह्मण मतदाता भाजपा से निराश है। ऐसे में शीला दीक्षित को आगे करके कांग्रेस ने एक अच्छा दांव खेला है और निश्चित रूप से उसे इसका फायदा मिलेगा।”

दरअसल, कहा जा रहा है कि कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को उत्तर प्रदेश में मृतप्राय कांग्रेस के लिए संजीवनी के तौर पर यही सबसे मजबूत कड़ी दिख रही थी। खासकर उस समय, जब भाजपा में भी ब्राह्मणों को नेतृत्व के लिहाज से कोई बहुत उम्मीद नहीं दिख रही थी।

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता वैसे तो महज 11 फीसद ही हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि मतदाताओं का यह वर्ग किसी पार्टी के लिए माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है।

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी न सिर्फ शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री घोषित करने के फैसले को चुनाव में भुनाएगी बल्कि वो इस बात को भी प्रचारित करेगी कि एकमात्र कांग्रेस पार्टी ने ही राज्य में ब्राह्मण मुख्यमंत्री दिए हैं।

सुभाष मिश्र कहते हैं कि यह सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ कांग्रेस पार्टी ने ही ब्राह्मण मुख्यमंत्री दिए हैं और जब से यह पार्टी सत्ता से बाहर हुई है, कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है।

कांग्रेस की इस घोषणा से ब्राह्मण वर्ग कितना प्रभावित हुआ है या होगा, ये तो आने वाले दिनों में पता चलेगा लेकिन कुछ हद तक हतोत्साहित कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में तो पार्टी के इस फैसले ने जान फूंकने का काम जरूर किया है।
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शीला ने बढ़ाई बीजेपी की बेचैनी

कांग्रेस की इस चाल से बीजेपी पर उम्मीदवार घोषित करने का दबाव बढ़ेगा। - फोटो : amar ujala
इलाहाबाद के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता फूलचंद दुबे कहते हैं कि शीला दीक्षित की उम्मीदवारी दूसरे पार्टियों के मुख्यमंत्री उम्मीदवारों की तुलना में हर दृष्टि से बीस ठहरती है, ऐसे में कांग्रेस पार्टी और कार्यकर्ताओं दोनों में उत्साह आएगा और इसका फायदा चुनाव में मिलेगा।

हालांकि खुद शीला दीक्षित अपनी उम्मीदवारी को जाति, धर्म संप्रदाय के आधार पर नहीं मानती हैं। बीबीसी से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो सभी जाति, धर्म, संप्रदाय के लोगों को साथ लेकर चलती है।

बहरहाल, कांग्रेस के इस फैसले का उसे चुनावी फायदा कितना मिलता है, ये तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा लेकिन जानकारों का कहना है कि पार्टी के इस फैसले ने दूसरे दलों को जरूर बेचैन कर दिया है। खासकर भारतीय जनता पार्टी को।

जानकारों का ये भी कहना है कि भाजपा पर अब न सिर्फ मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने का दबाव बढ़ेगा बल्कि ब्राह्मण समुदाय को अपने पक्ष में करना भी अब उसके लिए कम बड़ी चुनौती नहीं होगी।
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