यूपी विधानसभा की एक तस्वीर (फाइल फोटो)
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उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बीते दिन यानी शुक्रवार को पूर्व विधायक सलिल बिश्नोई की पिटाई करने के 18 साल से ज्यादा पुराने मामले को लेकर कुछ अलग ही नजारा देखने को मिला। पूरे 58 साल बाद विधानसभा कोर्ट रूम में बदल गई, सुनवाई भी हुई और फैसला भी सुनाया गया। मामला सितंबर 2004 का है। मामले में पूर्व डिप्टी एसपी अब्दुल समद समेत पांच पुलिसकर्मियों को विशेषाधिकार हनन के मामले में दोषी पाया गया और उन्हें एक दिन की सजा सुनाई गई। विधानसभा में इससे पहले साल 1964 में पहली बार अदालत बैठी थी। आइए जानते हैं क्या था पूरा मामला, जिसमें विधानसभा में सुनवाई हुई? ऐसा कब और कैसे होता है?...
विधानसभा कोर्ट रूम
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पहले जानते हैं उस मामले के बारे में
15 सितंबर 2004 को सलिल बिश्नोई पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बिजली की समस्याओं से संबंधित जिलाधिकारी को ज्ञापन देने के लिए जा रहे थे। इस बीच पुलिसकर्मियों और कार्यकर्ताओं में झड़प हो गई। इस दौरान तत्कालीन विधायक भी मौजूद थे। तत्कालीन सीओ अब्दुल समद और अन्य पुलिसकर्मियों की ओर से की गई लाठीचार्ज की कार्रवाई में सलिल बिश्नोई को चोटें आईं थीं। दावा किया जाता है कि सलिल बिश्नोई ने जब अपने विधायक होने का परिचय दिया तो अब्दुल समद ने कहा कि मैं बताता हूं कि विधायक क्या होता है। घटना के दौरान विधायक सलील बिश्नोई की टांग टूट गई थी। मामले में अब्दुल समद के अलावा तत्कालीन थाना प्रभारी किदवईनगर ऋषिकांत शुक्ला, तत्कालीन काकादेव एसआई त्रिलोकी सिंह, कांस्टेबल छोटे सिंह, विनोद मिश्रा और कांस्टेबल मेहरबान यादव को आरोपी बनाया गया था।
अब जानते हैं सलिल बिश्नोई के बारे में
2004 में सलिल बिश्नोई कानपुर के जनरलगंज सीट से भाजपा विधायक थे और राज्य में समाजवादी पार्टी कर सरकार थी। बिश्नोई मौजूदा समय में वह प्रदेश के पार्टी उपाध्यक्ष हैं और वर्तमान विधान परिषद सदस्य हैं।
किसने की शिकायत, कब तक चली सुनवाई?
मामले में अक्तूबर 2004 को सलिल बिश्नोई ने विधानसभा अध्यक्ष से विशेषाधिकार हनन की शिकायत दर्ज की। दो महीने बाद दिसंबर में मामला विशेषाधिकार समिति को जांच के लिए सौंपा गया। इसके बाद सात महीने तक मामले में सुनवाई हुई। इस दौरान प्रत्यक्षदर्शियों और आरोपियों के बयान दर्ज कर किए गए। इसके बाद कई सालों तक मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। अक्तूबर 2017 में सदन ने जांच रिपोर्ट के बारे में जानना चाहा। सितंबर 2022 में जांच रिपोर्ट पर फैसला लेने को कहा गया। 2004 में उनके साथ हुई घटना पर शुक्रवार तीन मार्च को विधानसभा के अंदर कोर्ट लगाकर सभी छह पुलिसकर्मियों को विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने सजा सुनाई। इन सभी पुलिसकर्मियों को विधानसभा में बनी सेल के लॉकअप में रात के 12 बजे तक रखा गया। क्षेत्राधिकारी अब्दुल समद रिटायर हो चुके हैं, लेकिन बाकी के पुलिसकर्मी सेवा में हैं।
यूपी विधानसभा में बजट पेश करते वित्तमंत्री सुरेश कुमार खन्ना और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
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किसने पेश किया था प्रस्ताव?
यूपी सरकार में संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने विधानसभा सत्र के दौरान विशेषाधिकार के हनन करने वाले पुलिसकर्मियों को सजा देने के लिए विधानसभा को कोर्ट में बदलने के लिए प्रस्ताव पेश किया था। इसके साथ ही उन्हें दंड देने के लिए भी प्रस्ताव रखा गया था। इन दोनों ही प्रस्ताव को विधानसभा ने पास कर दिया। सुरेश खन्ना ने यह भी कहा था कि अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का भी मौका दिया जाए। सबसे पहले अब्दुल समद ने अपना पक्ष रखते हुए सलील बिश्नोई और सदन से माफी मांगी।
विशेषाधिकार हनन क्या होता है?
भारतीय संविधान का आर्टिकल 105 और 194 सांसदों और विधायकों को अपने जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए कुछ विशेषाधिकार देता है। जब कोई उसमें खलल डालता है, तो सदस्य अपने विशेषाधिकार के हनन पर सवाल खड़े कर सकता है। सांसदों-विधायकों को दिए जाने वाले विशेषाधिकारों के तहत वह जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर किसी भी तरह का काम कर सकते हैं। इसमें धरना, प्रदर्शन आदि शामिल हैं। यदि उन्हें ऐसा करने से उन्हें रोका गया, तो इस पर विशेषाधिकार छीने जाने का मामला बनता है। इस मामले की सुनवाई संसद व विधानसभा के स्तर पर गठित विशेषाधिकार समिति करती है। यह एक स्थाई समिति है जो पूछताछ समिति के अंतर्गत आती है। यह समिति दोनों ही सदनों के विशेषाधिकार हनन के मामलों की जांच करती है।
सदन में कब लगती है अदालत?
विधायक के विशेषाधिकार पर सवाल के परीक्षण या संस्तुति के लिए विधानसभा अध्यक्ष उसे सदन की विशेषाधिकार समिति को भेजता है। इसके भी अध्यक्ष स्पीकर ही होते हैं। आर्टिकल 194(3) सदन को अधिकार देता है कि वह विशेषाधिकार या अवमानना के मामलों में फैसला ले सके। इसके लिए जांच करने, आरोपित को बुलाने और पेश करने का आदेश देने का भी अधिकार सदन के पास होता है। सदन की विशेषाधिकार समिति के नियमानुसार सदन निंदा, चेतावनी, निलंबन, जुर्माना, बर्खास्तगी या कारावास का दंड भी दे सकता है। सदन को किसी को सीधे सेवा से बर्खास्त करने का भी अधिकार है। हालांकि, लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले आर्टिकल 311 के तहत उन्हें सुनवाई का भी मौका देना होता है।
क्या ऐसे मामले में जेल हो सकती है?
सदन कारावास के दंड के साथ ही उस सजा को भोगने की जगह भी तय कर सकता है। मसलन उसे सरकारी जेल भी भेज सकता है या सदन के अपनी किस सेल में निरुद्ध कर सकता है। हालांकि, जेल की अवधि सत्र खत्म होने या सदन के विघटन से अधिक नहीं हो सकती है।
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पिछली बार कब ऐसा हुआ था?
यूपी में पहली बार साल 1964 में विधानसभा में अदालत लगी थी। तब विधानसभा के सदस्य केशव सिंह को गिरफ्तार करके अध्यक्ष के सामने पेश किया गया था। केशव सिंह ने कांग्रेस के विधायक नरसिंह पांडेय के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के पोस्टर विधानसभा के गलियारों में लगा दिए थे। उनकी इस हरकत की वजह से उन्हें विशेषाधिकार समिति ने तलब किया, तो उन्होंने आने से इनकार कर दिया। इस पर सदन ने उन्हें अवमानना का दोषी माना और 14 मार्च 1964 को सदन में पेश होने को कहा। मार्शल जब केशव को गोरखपुर से लेकर आए तो लखनऊ में वह स्टेशन पर ही लेट गए। उन्हें वहां से टांग कर लाना पड़ा। जब स्पीकर मदन मोहन वर्मा ने केशव से उनका नाम और आरोप पूछा तो उन्होंने कुछ भी नहीं बोला। केशव को सात दिन के कारावास के लिए जिला जेल भेजने का आदेश दिया गया। केशव वेल में फिर से लेट गए। उन्हें उठाकर ले जाना पड़ा। छह दिन की सजा काटने के बाद 19 मार्च को केशव की गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका दायर हुई। हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। इससे नाराज होकर स्पीकर ने फैसला देने वाले हाईकोर्ट के दोनों जज नसीरुल्ला बेग और जीडी सहगल को गिरफ्तार कर सदन में पेश करने के लिए वॉरंट जारी किया। गिरफ्तारी रोकने के लिए जजों को खुद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। कोर्ट ने गिरफ्तारी का आदेश रद्द कर दिया। हंगामा मचने पर विधानसभा ने भी गिरफ्तारी का वॉरंट वापस ले लिया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, जहां हाईकोर्ट के जजों का सम्मान सुरक्षित रहा और विधानसभा का भी। सुप्रीम कोर्ट ने केशव सिंह की जमानत रद्द की और सात दिन की सजा बरकरार रखी।