यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए पूर्व में घोषित 14 प्रत्याशियों को समाजवादी पार्टी ने एक झटके में बदलकर सियासी भूचाल ला दिया। इस कार्रवाई को शिवपाल यादव का सीएम पर पलटवार माना जा रहा है। साथ ही इसे चुनाव के बाद सीएम पद के लिए अपनी फिल्डिंग बिछाने के तौर पर भी देखा जा रहा है।
दरअसल, शनिवार को सीएम ने एक बार फिर शिवपाल से समाज कल्याण समेत दो विभाग वापस ले लिए थे, उसके 36 घंटे बाद ही प्रदेश अध्यक्ष ने सीएम और रामगोपाल के करीबी 14 प्रत्याशियों के टिकटों पर कैंची चला दी। साथ ही अपने व मुलायम के सात और करीबियों को टिकट थमा दिया। हालांकि प्रोफेसर रामगोपाल का कहना है कि टिकट बंटवारे को लेकर कोई मतभेद नहीं। सभी संतुष्ट हैं।
पार्टी के भीतर हुए इस फैसले से साफ है कि यूपी से सबसे बड़े राजनीतिक परिवार में सियासी विवाद ठंडा जरूर पड़ा है लेकिन अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सियासी जानकारों का मानना है कि चाचा (शिवपाल)और भतीजे (अखिलेश) में वर्चस्व बनाने को लेकर छिड़ा विवाद और गहरा सकता है। बताते हैं कि गायत्री प्रसाद प्रजापति को उनका पुराना विभाग खनन नहीं दिए जाने से सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह नाराज हैं। सबसे बड़े बजट वाला पीडब्लूडी डिपार्टमेंट वापस नहीं मिलने से शिवपाल सीएम से खफा है। इसी के साथ शनिवार को शिवपाल से दो विभाग सीएम ने और वापस ले लिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सारी खींचतान चुनाव बाद सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी (सीएम पद) हासिल करने के लिए हो रही है। पिछले दिनों हुए विवाद में अखिलेश यादव ने यही मांगा था कि टिकट वितरण में उनकी भी सुनी जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि सारा झगड़ा उनकी सीएम की कुर्सी को लेकर है। अब वह विवाद दिखने लगा है। 2012 में भी शिवपाल खुद सीएम बनना चाहते थे, लेकिन बाद में मुलायम सिंह के समझाने पर वह भारी मन से अखिलेश को सीएम बनवाने को राजी हो गए। अब माना जा रहा है कि चुनाव बाद सरकार बनने की स्थिति में सीएम बनने के लिए अगर विधायकों का समर्थन हासिल की नौबत आ जाती है तब ज्यादातर विधायक समर्थन में खड़े हो, दोनों में इसको लेकर फिल्डिंग़ बिछाने की होड़ हैै। शिवपाल यह कह भी चुके हैं कि सीएम कौन होगा, इसका फैसला विधायक करेंगे।