एम्स सीडीईआर के निदेशक डॉ. ओपी खरबंदा का कहना है कि 2010 से 2012 के बीच इस अध्ययन का प्री पायलट चरण पूरा किया था। वहीं 2012 से 2014 के बीच 164 कटे होंठ वाले बच्चों पर अध्ययन किया था। ये बच्चे एम्स, सफदरजंग और मेदांता अस्पताल में उपचार करा रहे थे। डॉ. खरबंदा ने बताया कि अभी इस अध्ययन का अंतिम चरण चल रहा है, जिसके लिए दिल्ली के अलावा हैदराबाद, गुवाहाटी और लखनऊ के डॉक्टर सहयोग कर रहे हैं। डॉ. खरबंदा का कहना है कि इस विकृति से जूझ रहे मरीजों को इलाज की तत्काल जरूरत होती है और इसके लिए गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान की व्यवस्था में सुधार की रणनीति बनाने की जरूरत है।
बच्चों को आती है काफी दिक्कतें
डॉ. खरबंदा ने बताया कि अध्ययन में पता चला है कि शराब, धूम्रपान, चूल्हे पर काम करना, ज्यादा दवाएं लेना या किसी रेडिएशन के संपर्क में आने के कारण होंठ कटे हो सकते हैं या तालू में कोई विकृति हो सकती है। कटे हुए होठों से बच्चे को बोलने और खाना चबाने में दिक्कत आती है। इससे दांत भी बेतरतीब हो जाते हैं, जबड़े से उनका तालमेल बिठाने में दिक्कत पेश आती है और चेहरे की आकृति बिगड़ी नजर आती है।