अमेरिका स्थित जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में बताया है कि एड्स वायरस को मानव शरीर में निष्क्रिय करने के लिए जीन थेरेपी का इस्तेमाल कारगर हो सकता है। यह खोज न केवल वायरस को स्थायी रूप से रोकने की क्षमता रखती है, बल्कि वर्तमान में उपयोग हो रही एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के दुष्प्रभावों से भी मुक्ति दिला सकती है।
एचआईवी वायरस को निष्क्रिय करने की दिशा में विज्ञान ने एक बड़ी छलांग लगाई है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एक ऐसे आणविक हथियार की पहचान की है, जो एड्स वायरस को लंबे समय तक सोने की अवस्था में डाल सकता है। जीन थेरेपी के जरिये वायरस को स्थायी तौर पर निष्क्रिय करना अब संभव होता जा रहा है। इससे न केवल मरीजों को हर दिन ली जाने वाली दवाओं से राहत मिलेगी बल्कि उनके दुष्प्रभावों से भी बचा जा सकेगा।
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अमेरिका स्थित जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में बताया है कि एड्स वायरस को मानव शरीर में निष्क्रिय करने के लिए जीन थेरेपी का इस्तेमाल कारगर हो सकता है। यह खोज न केवल वायरस को स्थायी रूप से रोकने की क्षमता रखती है, बल्कि वर्तमान में उपयोग हो रही एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के दुष्प्रभावों से भी मुक्ति दिला सकती है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘साइंस एडवांस’ में प्रकाशित हुआ है। इसमें वैज्ञानिकों ने ‘एंटीसेंस ट्रांसक्रिप्ट’ (एएसटी) नामक एक अणु की भूमिका को उजागर किया है। यह एचआईवी की आनुवंशिक सामग्री द्वारा निर्मित होता है और वायरस को ऐसी अवस्था में पहुंचा देता है जहां वह खुद को दोहरा नहीं पाता, यानी निष्क्रिय रहता है।
इस तरह की गई खोज
शोधकर्ताओं ने सीडी4+ टी कोशिकाओं (जो एचआईवी वायरस का प्रमुख निशाना होती हैं) में आनुवंशिक बदलाव कर एएसटी के उत्पादन को बढ़ाया। उन्होंने कोशिकाओं में ऐसे डीएनए तत्व डाले जो एएसटी की कई प्रतियां बना सके। फिर फ्लोरोसेंट प्रोटीन जीएफपी की मदद से मापा गया कि वायरस कितनी गति से खुद की प्रतियां बना रहा है। परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे। एएसटी की उपस्थिति में वायरस का दोहराव लगभग शून्य हो गया। इसके बाद लेजर तकनीक से यह पता लगाया गया कि एएसटी अणु के कौन से हिस्से एचआईवी को निष्क्रिय करने वाले प्रोटीन से जुड़ते हैं। इसके लिए वैज्ञानिकों ने अणु में कई तरह के म्युटेशन (उत्परिवर्तन) कर यह समझने की कोशिश की कि प्रत्येक भाग की भूमिका क्या है।
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मानव कोशिकाओं में भी परीक्षण
अध्ययन का एक अहम हिस्सा उन 15 एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों पर आधारित था, जिनकी अनुमति से उनकी प्रतिरक्षा कोशिकाएं एकत्रित की गईं। इन कोशिकाओं में भी एएसटी को प्रवेश कराया गया और देखा गया कि वायरस सक्रिय है या निष्क्रिय। यहां भी परिणाम समान रहे, वायरस निष्क्रिय अवस्था में चला गया यानी सो गया।
एआरटी का लंबा उपयोग होता है नुकसानदेह
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनिया में 3.99 करोड़ लोग एचआईवी से संक्रमित हैं, जिनमें से हर साल 6.3 लाख लोगों की मौत हो जाती है। अभी तक इलाज का मुख्य तरीका एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) है, जिसे रोजाना लेना पड़ता है। हालांकि इसके लंबे समय तक सेवन से लीवर डैमेज, मेटाबॉलिक गड़बड़ियां और हड्डियों की कमजोरी। वहीं, जीन थेरेपी एक ही खुराक में असर दिखा सकती है, जो भविष्य के उपचार का मार्ग प्रशस्त करती है।