Explainer: US-ईरान डील के बाद होर्मुज से क्यों छिपकर निकल रहे जहाज, भारत की तेल-गैस आपूर्ति पर कैसे होगा असर?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 30 Jun 2026 07:39 PM IST
सार
अमेरिका और ईरान के युद्ध को रुके अब दो हफ्ते होने वाले हैं। हालांकि, अब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों-टैंकरों की आवाजाही सामान्य नहीं हो पाई है। कई पोत गुपचुप ढंग से अपने ट्रांसपॉन्डर बंद कर के क्षेत्र को पार करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि ईरान की तरफ से गुजरने पर यह पोत अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में आ सकते हैं तो वहीं दूसरे मार्गों से निकलने पर ईरान के ड्रोन-मिसाइल हमलों के दायरे में।
अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को शुरू हुआ युद्ध फिलहाल थम गया है। दोनों ही देशों ने कुछ शर्तों के साथ संघर्ष को रोकने पर सहमति जताई है। इसी के साथ युद्ध के दौरान ईरान की तरफ से बंद किया गया होर्मुज जलडमरूमध्य भी वाणिज्यिक पोतों के परिवहन के लिए खोल दिया गया। लेकिन अब ईरान की तरफ से होर्मुज के इस्तेमाल के लिए भी कथित तौर पर नियम तय करने के बाद इस जलक्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों-टैंकरों के लिए भ्रम की स्थिति है। इस बीच सामने आया है कि भारत आने वाले कई जहाज छिपकर होर्मुज पार कर रहे हैं, ताकि किसी खतरे की स्थिति से बचा जा सके।
नौपरिवहन मामलों पर नजर रखने वाली कंपनी केप्लर की तरफ से हाल ही में जारी किए गए डेटा के मुताबिक, फारस की खाड़ी से भारत की तरफ आने वाले करीब 62 फीसदी जहाजों और टैंकरों ने होर्मुज पार करने के दौरान अपने ट्रांसपॉन्डर बंद कर लिए, ताकि उन्हें इस संवेदनशील इलाके में ट्रैक न किया जा सके। यह अपने आप में चौंकाने वाली बात इसलिए है, क्योंकि अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध रोकने पर जून के मध्य में ही सहमति बन गई थी और 17 जून को दोनों देशों ने इससे जुड़े एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए थे।
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होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय जहाजों को बंद करना पड़ रहा ट्रैकिंग सिस्टम।
- फोटो : अमर उजाला
अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को शुरू हुआ युद्ध फिलहाल थम गया है। दोनों ही देशों ने कुछ शर्तों के साथ संघर्ष को रोकने पर सहमति जताई है। इसी के साथ युद्ध के दौरान ईरान की तरफ से बंद किया गया होर्मुज जलडमरूमध्य भी वाणिज्यिक पोतों के परिवहन के लिए खोल दिया गया। लेकिन अब ईरान की तरफ से होर्मुज के इस्तेमाल के लिए भी कथित तौर पर नियम तय करने के बाद इस जलक्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों-टैंकरों के लिए भ्रम की स्थिति है। इस बीच सामने आया है कि भारत आने वाले कई जहाज छिपकर होर्मुज पार कर रहे हैं, ताकि किसी खतरे की स्थिति से बचा जा सके।
नौपरिवहन मामलों पर नजर रखने वाली कंपनी केप्लर की तरफ से हाल ही में जारी किए गए डेटा के मुताबिक, फारस की खाड़ी से भारत की तरफ आने वाले करीब 62 फीसदी जहाजों और टैंकरों ने होर्मुज पार करने के दौरान अपने ट्रांसपॉन्डर बंद कर लिए, ताकि उन्हें इस संवेदनशील इलाके में ट्रैक न किया जा सके। यह अपने आप में चौंकाने वाली बात इसलिए है, क्योंकि अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध रोकने पर जून के मध्य में ही सहमति बन गई थी और 17 जून को दोनों देशों ने इससे जुड़े एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए थे।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर होर्मुज में अभी नौपरिवहन की क्या स्थिति है? क्यों जहाज होर्मुज से निकलने के दौरान अपने ट्रैकिंग सिस्टम कों बंद कर रहे हैं? भारत के जहाजों का ऐसा करने के पीछे की वजह और आंकड़े क्या हैं? इससे भारत की तेल-गैस सप्लाई किस तरह और कितनी प्रभावित हो सकती है? आइये जानते हैं...
होर्मुज में अभी नौपरिवहन की क्या स्थिति है?
होर्मुज जलडमरूमध्य में नौपरिवहन की वर्तमान स्थिति सुरक्षा चिंताओं की वजह से काफी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, हालांकि हाल ही में यातायात में थोड़ी रिकवरी देखी गई है, फिर भी स्थिति सामान्य से निचले स्तर पर है।
1. यातायात में बेहद धीमी रिकवरी
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष पर रोक लगाने और राजनयिक वार्ता फिर से शुरू करने की सहमति के बाद जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में मामूली सुधार हुआ है। हाल के दिनों में दैनिक यातायात लगभग 24 से 42 जहाजों के बीच दर्ज किया गया है, जो कि संघर्ष से पहले के 50-100+ जहाजों के दैनिक औसत से काफी कम है।
2. होर्मुज में ही बंटे कई मार्ग
केप्लर के डेटा के मुताबिक, लगभग 94% जहाज अब अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) की तरफ से निर्धारित आधिकारिक शिपिंग लेन के बाहर से गुजर रहे हैं। अधिकतर जहाज ओमान की तटरेखा के करीब वाले मार्ग का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे होर्मुज में बाकी रास्तों के मुकाबले सुरक्षित माना जा रहा है।
3. गुपचुप तरीके से निकल रहे जहाज
खतरों से बचने के लिए एक बड़ी संख्या में कमर्शियल जहाज अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस) ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं, ताकि वे रडार से अदृश्य रहें और उनकी लोकेशन गुप्त रहे। इनमें बड़ी संख्या भारत आने वाले जहाजों की है।
जब अमेरिका-ईरान युद्ध रुका तो होर्मुज में ऐसी स्थिति क्यों?
युद्ध विराम के बाद भी जहाजों पर ईरान के हमले जारी
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष पर रोक लगाने और कूटनीतिक वार्ता फिर से शुरू करने की सहमति के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति पूरी तरह से सामान्य नहीं हुई है। दरअसल, युद्ध विराम लागू होने के बाद भी होर्मुज में ईरानी जलक्षेत्र के करीब से न निकलने वाले जहाजों पर ईरान की तरफ से हमले किए गए थे। ईरान ने बीते हफ्ते होर्मुज जलडमरूमध्य के पास सिंगापुर के झंडे वाले मालवाहक जहाज एवर लवली पर ड्रोन से हमला किया। इसके बाद शनिवार को पनामा के झंडे वाले वाणिज्यिक टैंकर 'एम/टी किकु' को भी एक ईरानी ड्रोन द्वारा निशाना बनाया गया, जो 20 लाख बैरल से अधिक कच्चा तेल ले जा रहा था। इन घटनाओं के चलते जहाज ऑपरेटरों का ईरान पर से भरोसा उठ गया है।
होर्मुज में जहाजों के गुजरने के लिए बने तीन रास्ते।
- फोटो : अमर उजाला
इससे पहले ईरान ने सुरक्षित मार्ग देने के बाद भी कई जहाजों को निशाना बनाया था। मध्य-अप्रैल में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) की नौसेना की तरफ से क्लीयरेंस मिलने के बावजूद भारतीय झंडे वाले टैंकर सैनमार हेराल्ड पर हमला किया गया था। इसके अलावा मई के मध्य में ओमान तट के पास एक भारतीय कार्गो जहाज संदिग्ध ईरानी हमले के कारण डूब गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस क्षेत्र का कोई भी मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
नाजुक युद्ध विराम की स्थिति
अमेरिका और ईरान ने कूटनीतिक वार्ता (जैसे कतर के दोहा में) फिर से शुरू की है, लेकिन यह युद्धविराम अभी बहुत अस्थिर है। वाशिंगटन और तेहरान दोनों ही एक-दूसरे पर अंतरिम सीजफायर के उल्लंघन का आरोप लगा चुके हैं। ईरानी अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि अभी तक अंतिम समझौते को लेकर औपचारिक बातचीत अपने मुकाम तक नहीं पहुंची है।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की सुरक्षा चिंताएं
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, आईएमओ ने होर्मुज जलडमरूमध्य के लिए अपने आपातकालीन निकासी ढांचे को बनाया था। हालांकि, ईरान के हमलों और उसके बाद अमेरिका के पलटवार के चलते आईएमओ ने इस मार्ग को अस्थायी रूप से हटा दिया। एजेंसी ने साफ कहा है कि जब तक व्यावसायिक नौपरिवहन के लिए विश्वसनीय सुरक्षा आश्वासन नहीं मिल जाते, यह ढांचा निलंबित रहेगा।
बार-बार बदलते नियम और एस्कॉर्ट्स में कमी
संघर्ष शुरू होने के बाद से ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए लगातार अपने दिशा-निर्देश बदल रहा है, जिससे भारी असमंजस पैदा हो रहा है। इसके बचाव में ओमान के रास्ते से गुजरने वाले जहाजों के लिए सुरक्षा बेड़े शुरू किए गए थे, लेकिन कुछ ही दिनों के अंदर उन्हें भी काफी कम कर दिया गया, जिससे जहाजों को बिना सुरक्षा के गुजरना पड़ रहा है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का कानूनी जाल
ऐसा नहीं है कि होर्मुज में जहाजों की बुरी स्थिति के लिए सिर्फ ईरान के हमले ही जिम्मेदार हैं। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग (ओएफएसी) ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ वित्तीय लेन-देन करने वाले जहाजों के अलावा सुरक्षित मार्ग के लिए ईरानी अधिकारियों को अपने जहाज की जानकारी देना, उनके साथ समन्वय करना या क्लीयरेंस मांगना भी अमेरिकी के सेकेंडरी प्रतिबंधों का उल्लंघन माना जा सकता है। इससे जहाज किराए पर देने वाली कंपनियों, ऑपरेटरों और बैंकों को भारी कानूनी जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।
बीमा लागत और अनुबंधों का जोखिम
ड्रोन और मिसाइल हमलों जैसी घटनाओं के चलते जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा की लागत अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। इसके अलावा मार्ग से निकलने में देरी, इसमें बदलाव और सुरक्षा मंजूरी को लेकर जटिल कॉन्ट्रैक्ट जोखिम पैदा हो गए हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य
- फोटो : Amar Ujala Digital
संक्षेप में कहा जाए तो भले ही अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध रुका हो और आधिकारिक रूप से बातचीत चल रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर लगातार हमलों के डर, टूटे हुए भरोसे, कानूनी प्रतिबंधों के जोखिम और विश्वसनीय सुरक्षा की कमी की वजह से जहाजों पर खतरा पैदा हो गया है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में, जहां से गुजरने वाले जहाज कभी भी ईरानी हमले या अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में आ सकते हैं।
क्यों जहाज होर्मुज से निकलने के दौरान अपने ट्रैकिंग सिस्टम कों बंद कर रहे हैं?
ईरान के अप्रत्याशित हमले और अमेरिका के सेकेंडरी सैंक्शन्स के डर से अब अधिकतर जहाज निगरानी से बचने के लिए अपने ट्रैकिंग सिस्टम को बंद कर रहे हैं। इस प्रक्रिया को शिपिंग उद्योग की भाषा में गोइंग डार्क यानी जलक्षेत्र में गायब हो जाना, कहते हैं। समुद्री नियमों के तहत जहाजों को हर समय अपना एआईएस ट्रांसपॉन्डर चालू रखना होता है, जो लगातार उनकी पहचान, सटीक स्थान और गंतव्य को दर्शाता रहता है। चूंकि मौजूदा समय में होर्मुज तनाव की वजह से एक जोखिम वाला क्षेत्र बन गया है, इसलिए जहाज ईरानी बलों की नजरों से बचने के लिए अपनी पहचान और स्थान को गुप्त रखना ही सबसे सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।
ऐसे जहाज जिन पर उन देशों का झंडा लगा है, जिन्हें पश्चिमी देशों का सहयोगी या ईरान का विरोधी माना जाता है, वे हमलों के प्रति सबसे ज्यादा जोखिम में माने जा रहे हैं। इस खतरे को कम करने के लिए ये जहाज अपना सिस्टम बंद कर रहे हैं। इतना ही नहीं खतरे को देखते हुए जहाज अब अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की आधिकारिक लेन के बजाय ओमान की तटरेखा के करीब वाले मार्ग का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इस रास्ते पर भी वे सुरक्षा के लिहाज से अपने ट्रैकिंग सिस्टम को बंद (डार्क) ही रख रहे हैं, ताकि ईरान उनकी इस हरकत से नाराज होकर ड्रोन-मिसाइल से उन्हें निशाना न बना ले।
होर्मुज जलडमरूमध्य से छिपकर निकल रहे भारतीय जहाज।
- फोटो : अमर उजाला
छिपकर होर्मुज से भारत आने वाले जहाजों के क्या आंकड़े?
केप्लर के मुताबिक, फारस की खाड़ी से भारत आने वाले लगभग 62% टैंकरों और कार्गो जहाजों ने जलडमरूमध्य पार करते समय अपना ट्रैकिंग ट्रांसपॉन्डर बंद कर दिया।
1 मई से 25 जून के बीच, भारत आने वाले कुल 73 जहाज होर्मुज से गुजरे, जिनमें से 45 जहाजों ने अपनी लोकेशन और पहचान का प्रसारण किए बिना यानी छिपकर यात्रा की।
इस अवधि में सिर्फ चार भारतीय झंडे वाले जहाजों ने इस जलडमरूमध्य को पार किया। इनमें से दो ने अपना ट्रैकिंग सिस्टम बंद रखा, जबकि अन्य दो ने दोनों मार्गों (ईरान और ओमान लेन) से गुजरते हुए अपना सिस्टम चालू रखा।
पनामा, लाइबेरिया, यूएई और मार्शल द्वीप समूह के झंडे वाले कम से कम 69 भारत आने वाले जहाजों ने भी अपना सिस्टम बंद किया। इनमें से 14 ने ओमान की ओर वाले रास्ते का और 10 ने ईरान-नियंत्रित लेन का इस्तेमाल किया, जिससे पता चलता है कि किसी भी मार्ग पर जहाज अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते।
भारत की तेल-गैस सप्लाई किस तरह और कितनी प्रभावित हो सकती है?
होर्मुज जलडमरूमध्य में चल रहे संकट और जहाजों पर मंडराते खतरे के बावजूद भारत की तेल और गैस आपूर्ति फिलहाल पूरी तरह से सुरक्षित है और इसके बड़े पैमाने पर प्रभावित होने की संभावना नहीं है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, भारत ने अपनी आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं।
1. 70% कच्चे तेल की सप्लाई अब बाहरी स्रोतों से
भारत ने अपनी निर्भरता को होर्मुज से काफी कम कर लिया है। वर्तमान में देश का लगभग 70% कच्चा तेल आयात होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर के स्रोतों से आ रहा है।
2. जरूरत के मुताबिक तेल सुरक्षित
सरकार और तेल विपणन कंपनियों ने मिलकर कच्चे तेल की इतनी मात्रा सुरक्षित कर ली है जो उस मात्रा से भी ज्यादा है, जो सामान्य तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से भारत पहुंचती थी।
3. 40 देशों से हो रहा आयात
जोखिम को कम करने के लिए भारत ने अपने तेल-गैस आयात स्रोतों का बड़े पैमाने पर विविध किया है। भारत अब 40 विभिन्न देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा है, जिससे किसी एक मार्ग पर निर्भरता खत्म हो गई है। गैस की आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारतीय गैस कंपनियों ने नए स्रोतों से एलएनजी कार्गो की खरीद भी की है।