फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

महंगाई पर अमेरिकी फेड का बड़ा फैसला: भारत पर क्या असर पड़ेगा? अब अक्तूबर में आरबीआई की होगी अग्निपरीक्षा

Sat, 19 Sep 2026 11:04 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर बढ़ाने और सख्त रुख अपनाने के बाद भारत में भी अक्टूबर में रेपो रेट बढ़ने की संभावना बढ़ गई है। यस बैंक की रिपोर्ट में महंगाई, कच्चे तेल की कीमत और भारत-अमेरिका की ब्याज दरों के घटते अंतर को अहम कारण बताया गया है। लेकिन क्या आरबीआई सच में अक्तूबर में दर बढ़ाएगा? नकदी और महंगाई की स्थिति उसके फैसले को कितना प्रभावित करेगी? 

विज्ञापन
अमेरिकी फेड के सख्त रुख से आरबीआई क्यों चिंतित? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख के बाद अब भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई पर भी ब्याज दर बढ़ाने का दबाव बढ़ सकता है। यस बैंक की एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर और कम हुआ है। ऐसे में अक्तूबर में आरबीआई की ओर से रेपो रेट बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, आरबीआई का फैसला घरेलू आर्थिक विकास और महंगाई की स्थिति पर निर्भर करेगा।

अक्तूबर में आरबीआई ब्याज दर क्यों बढ़ा सकता है?

  • वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में मजबूती बनी हुई है।
  • अगस्त में खुदरा महंगाई यानी सीपीआई बढ़ी है।
  • मुख्य महंगाई यानी कोर इंफ्लेशन में भी बढ़ोतरी हुई है।
  • भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर और कम हुआ है।
  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों से लगातार शुद्ध निकासी हो रही है।
  • ब्याज दरों का कम अंतर भारतीय मुद्रा बाजार पर दबाव बढ़ा रहा है।
  • हालांकि, आरबीआई के फैसले में घरेलू आर्थिक विकास और महंगाई की स्थिति सबसे अहम रहेगी।

अमेरिकी फेड के फैसले का भारत पर क्या असर पड़ा?

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी नीतिगत ब्याज दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर इसे 3.75 से 4 प्रतिशत के दायरे में कर दिया है। यह फैसला 12-0 से सर्वसम्मति से लिया गया। फेड ने 2026 के लिए महंगाई और आर्थिक विकास के अनुमान भी बढ़ाए हैं। वहीं, बेरोजगारी का अनुमान घटाया गया है। यस बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, फेड के इस सख्त रुख ने बाजार की उम्मीदें बदल दी हैं और निवेशक अब इस साल दिसंबर में भी 25 आधार अंक की एक और दर बढ़ोतरी की संभावना देख रहे हैं।
विज्ञापन


ये भी पढ़ें- एक्सप्लेनर: ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क का अमेरिका से कैसा समझौता, क्या अब द्वीप-देश पर होगा ट्रंप का नियंत्रण?

अमेरिका की महंगाई और रोजगार के आंकड़ों में क्या दिखा?

फेड ने 2026 के लिए अमेरिका की जीडीपी वृद्धि का अनुमान 2.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 2.3 प्रतिशत कर दिया है। बेरोजगारी का अनुमान 4.3 प्रतिशत से घटाकर 4.1 प्रतिशत किया गया है। वहीं, व्यक्तिगत उपभोग व्यय यानी पीसीई महंगाई का अनुमान 3.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.7 प्रतिशत और कोर पीसीई महंगाई का अनुमान 3.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.4 प्रतिशत कर दिया गया है। यस बैंक के मुताबिक, अमेरिका का मजबूत श्रम बाजार फेड को महंगाई पर ध्यान बनाए रखने की गुंजाइश दे रहा है। अगस्त में गैर-कृषि क्षेत्र में 1.62 लाख नौकरियां बढ़ीं, जबकि जुलाई में नौकरी के अवसर बढ़कर 72.7 लाख हो गए।

भारत में ब्याज दरों का अंतर कम होने से क्या असर पड़ेगा?

भारत और अमेरिका की ब्याज दरों के बीच अंतर कम होने से भारतीय मुद्रा बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय बाजार से लगातार शुद्ध निकासी कर रहे हैं। ऐसे माहौल में आरबीआई के सामने ब्याज दर और नकदी प्रबंधन दोनों अहम मुद्दे बन सकते हैं। हालांकि, सिर्फ अमेरिकी फेड के फैसले के आधार पर आरबीआई दर बढ़ाएगा, ऐसा तय नहीं है। घरेलू विकास और महंगाई के आंकड़े उसके फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

आरबीआई के लिए अतिरिक्त नकदी क्यों बन सकती है चुनौती?

यस बैंक ने कहा है कि अक्तूबर में दर बढ़ाने का असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आरबीआई बाजार में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कितनी प्रभावी तरीके से सोख पाता है। फिलहाल भारित औसत कॉल दर यानी डब्ल्यूएसीआर 5.05 प्रतिशत है। बैंक ने कहा कि वह आरबीआई की नकदी सोखने वाली कार्रवाइयों की सफलता पर नजर रखेगा। इसके बाद ही अक्तूबर की रेपो दर पर ज्यादा स्पष्ट राय बनाई जा सकेगी। यानी अक्तूबर में दर बढ़ाने की संभावना बढ़ी है, लेकिन अंतिम फैसला घरेलू महंगाई, विकास और बाजार में नकदी की स्थिति को देखकर ही होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें