एनटीआरओ (राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन) और डीआरडीओ जैसे संगठनों को भी ड्रोन की जानकारी देने, उसे पकड़ने वाले रडार और मार गिराने वाला सिस्टम तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। ड्रोन को हथियार से मार गिराने की बजाए कोई ऐसा सिस्टम तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है, जो ड्रोन के संचार सिस्टम को ही ठप कर सके।
विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच ड्रोन को लेकर कुछ माह पहले तनातनी हो गई थी। यह नहीं स्पष्ट हो पा रहा था कि ड्रोन आने की जानकारी सबसे पहले किस एजेंसी के पास होनी चाहिए। अगर ड्रोन दिख रहा है, तो उसे जब्त करने या मार गिराने की जिम्मेदारी किसके पास है।
स्थानीय प्रशासन की ओर से कहा जाता है कि हमारी पुलिस के पास ऐसे कोई तकनीकी उपकरण नहीं है, जिससे कि ड्रोन को मार गिराया जा सके।
सीमावर्ती इलाकों का सिविल प्रशासन इसके लिए बीएसएफ को ही कह सकता है। दूसरी ओर बीएसएफ का यह कहना था कि ड्रोन को मार गिराने वाले पर्याप्त उपकरण हमारे पास नहीं हैं। ऐसे मामले में एयरफोर्स बेहतर कर सकती है।
इस मामले में जब एयरफोर्स से कहा गया तो उनका जवाब था कि ड्रोन ज्यादा ऊंचाई पर नहीं होते, इसलिए हमारा रडार वहां तक नहीं पहुंच सकता।
गृह मंत्रालय ने इन सब बातों को एक बड़ी लापरवाही मानते हुए विभिन्न एजेंसियों से जवाब तलब किया था। पाकिस्तान की ओर से भारतीय सीमा में अनेक ड्रोन आ चुके हैं। जिन इलाकों में ये ड्रोन देखे गए, वहां के स्थानीय लोगों ने भी इसकी पुष्टि की है। इनमें अनेक ड्रोन तो रात के समय आए हैं।
बीएसएफ के एक अधिकारी का कहना है कि दिन में ड्रोन जैसी कोई भी वस्तु दिखती है, तो हम अपने कंट्रोल रुम को सूचित कर देते हैं। अगर वहां से आदेश आता है, तो ड्रोन को मार गिराया जाता है।
हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है। अगर ड्रोन पांच सौ मीटर से ऊपर है, तो उसे पकड़ पाना मुश्किल होता है। रात में हमारे पास ऐसा कोई उपकरण नहीं है, जिससे हम उसे देख सकें या गिराने में सफल हो जाएं। बीएसएफ के सूत्र बताते हैं कि हम कई कंपनियों के उपकरण देख रहे हैं।