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UPSC 2017: जिद-जुनून से जीता जहां, कुछ यूं तय किया IAS तक का सफर, पढ़े इन युवाओं के संघर्ष की कहानी

Sat, 28 Apr 2018 10:51 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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लाखों युवा अधिकारी बनने का सपना लिए हर साल सबसे कठिन माने जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा में बैठते हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जो तमाम विपरीत परिस्थितियों को पीछे छोड़ सफलता पाते हैं। उनकी कहानियां प्रेरणा बन जाती हैं। कुछ ऐसे ही युवाओं की कहानी, जिन्होंने अपने सपने को साकार करने की जिद और जुनून से जहां जीत लिया...

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एम शिवागुरु प्रभाकरन - (रैंक-101, तंजावुर तमिलनाडु)

शराबी पिता, गरीबी और परिवार की जिम्मेदारी। इन सब जद्दोजहद के बीच अपने सपने को जीवित रखना ही बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन तमिलनाडु के तंजावुर जिले के पट्टुकोट्टई के एक गांव के रहने वाले एम शिवागुरु प्रभाकरन ने अपनी हिम्मत, जज्बे और हौसले से न ये सब जिम्मेदारियां निभाईं, बल्कि आईएएस बनने के सपने को भी पूरा कर लिया। प्रभाकरण परिवारिक परिस्थितियों के चलते 12वीं के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पाए। 

हिम्मत, हौसले के दम पर तय किया मजदूरी से आईएएस तक का सफर

दो साल तक आरा मशीन में लकड़ियां काटी और मजदूरी की। दिल के एक हिस्से में आईएएस बनने का सपना दबा था। 2008 में छोटे भाई को इंजीनियरिंग कराने में मदद की और बहन की शादी कराई। फिर आईआईटी में प्रवेश का सपना आंखों में लेकर चेन्नई पहुंचे। यहां दिन में पढ़ाई करते और रात सेंट थॉमस माउंट रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर काटा करते। मेहनत रंग लाई। आईआईटी मद्रास में एडमिशन मिला। 2014 में एमटेक में टॉप किया। इसके बाद शुरू हुआ आईएएस का सपना पूरा करने का मिशन। चौथे प्रयास में प्रभाकरन ने उसे भी साकार कर लिया। उनकी ऑल इंडिया 101 रैंक है।

अभिषेक सुराणा - (रैंक -10 भीलवाड़ा, राजस्थान)

मन में कुछ करने की ठान रखी हो तो मंजिल मिलकर ही रहती है। कुछ ऐसी ही कहानी है भीलवाड़ा के 25 साल के अभिषेक सुराणा की। उन्हें हमेशा से आईएएस ही बनना था। इसीलिए तो पहले आईएफएस और फिर आईपीएस बनने के बावजूद उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा और टॉप टेन में शामिल होकर आईएएस बनने के ख्वाब को पूरा कर लिया। अभिषेक इस समय हैदराबाद में आईपीएस की ट्रेनिंग ले रहे हैं। वह 2017 में 250वीं रैंकिंग के साथ इसके लिए चुने गए थे। उन्हें पश्चिम बंगाल कैडर मिला। इससे पहले, 2016 में वह आईएफएस के लिए चुने गए और मध्य प्रदेश कैडर मिला। लेकिन उनका सपना आईएएस बनना था, लिहाजा कोशिश जारी रखी। 

आईएफएस, आईपीएस और अब टॉप टेन रैंक के साथ आईएएस

पिता डा. अनिल सुराणा राजकीय कॉलेज में प्राध्यापक हैं। मां सुनीता सुराणा समाज सेविका हैं। अभिषेक ने आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की। इसके बाद सिंगापुर में दो साल नौकरी की। लेकिन मन सिविल सेवा पर लगा रहा। आईएफएस में ऑल इंडिया में दूसरे पायदान पर रहे थे। सुराणा के माता-पिता के अनुसार, अभिषेक के दादा स्व. मूलचंद सुराणा उस समय के भीलवाड़ा के कलक्टर को देखकर कहा करते थे कि उनका पोता भी कलक्टर बने। आज पोते ने दादा की इच्छा पूरी कर दी।
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सन्नी कुमार सिंह - (रैंक -91, गोपालगंज, बिहार)

सन्नी के माता-पिता
गोपालगंज के एक गरीब किसान के 27 वर्षीय बेटे सन्नी कुमार सिंह ने सिविल सेवा परीक्षा में 91वां रैंक हासिल किया है। वह थावे के बेदुटोला स्थित नया टोला के रहने वाले है। पिता प्रभुनाथ सिंह अपने पत्नी विंध्यवासिनी देवी के साथ रहते हैं। उनके अनुसार, महज 2 बीघा जमीन में इकलौते बेटे को अच्छी शिक्षा का सपना पूरा नहीं कर सकते थे लिहाजा सऊदी अरब के रियाद चले गए। वहां मजदूरी की। सन्नी ने मैट्रिक की परीक्षा गोपालगंज में पूरी की इसके बाद मुड़कर पीछे नहीं देखा। 

बेटे को आईएएस बनाने को पिता ने विदेश में की मजदूरी

मैकेनिकल में बीटेक की डिग्री हासिल करने के बाद सन्नी ने एक ऑटोमोबाइल कंपनी में जॉब की। इसके बाद गृहमंत्रालय में बतौर अधिकारी नौकरी पाई। लेकिन पिता का सपना बेटे को आईएएस देखना था। सन्नी ने यूपीएससी की परीक्षा दी और 91वां रैंक हासिल किया। फिलहाल मिजोरम में तैनात अपनी कामयाबी से बहुत खुश हैं।
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