केरल हाईकोर्ट ने प्रजनन में मददगार तकनीक (ART) के इस्तेमाल की ऊपरी आयु सीमा तय करने पर सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही उसने केंद्र सरकार से इस पाबंदी पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है।
केरल हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार का निर्माण करना व्यक्ति का मूलभूत अधिकार व निजी पसंद है। ऐसे में प्रजनन में मददगार तकनीकों (assisted reproductive technology) के इस्तेमाल के लिए अधिकतम उम्र की सीमा तय करना प्रतिबंध की तरह है। इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने नेशनल असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एंड सरोगेसी बोर्ड को निर्देश दिया कि वह केंद्र सरकार को एआरटी का उपयोग करने की उच्च आयु सीमा पर फिर से विचार करने की जरूरत बताए।
आयु का प्रतिबंध तर्कहीन व मनमाना
केरल हाईकोर्ट के जस्टिस वी.जी. अरुण ने कहा कि आयु का प्रतिबंध लगाना तर्कहीन और मनमाना है। यदि यह कुछ समय के लिए भी लगाया गया तो भी अनुचित है। हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर को जारी आदेश में यह भी कहा कि संतान पैदा करने के लिए व्यक्तिगत पसंद एक मौलिक अधिकार है, जिसे ऊपरी आयु सीमा तय करके प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
इसी तरह परिवार बनाने और परिवार बनाने के लिए व्यक्तियों की व्यक्तिगत पसंद को उसके मौलिक अधिकार का एक पहलू माना जाता है। एआरटी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए ऊपरी आयु सीमा तय करके इस अधिकार को प्रतिबंधित किया जा रहा है।
महिलाओं के लिए 50 साल व पुरुषों के लिए 55 साल उम्र तय
केरल हाईकोर्ट ने उक्त निर्देशों के साथ ही एआरटी की उच्च उम्र सीमा तय करने को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का निपटारा कर दिया। देश में एआरटी के माध्यम से संतान पैदा करने के लिए
सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (एआरटी) (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत महिलाओं की उच्च उम्र सीमा 50 साल और पुरुषों की 55 साल है। याचिकाओं में इसे चुनौती दी गई थी।
एआरटी कानून 25 जनवरी 2022 को पेश किया गया था। हाईकोर्ट ने उन याचिकाकर्ताओं को एआरटी की अनुमति दी है, जो 25 जनवरी, 2022 तक एआरटी का उपचार करा रहे थे। उन्हें उम्र सीमा पार होने के बाद भी इसे जारी रखने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने राष्ट्रीय बोर्ड को एआरटी अधिनियम में एक संक्रमणकालीन प्रावधान शामिल करने की आवश्यकता को केंद्र सरकार के ध्यान में लाने के लिए भी कहा।