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Supreme Court: शीर्ष कोर्ट ने टाली मेनका गांधी की याचिका पर सुनवाई; अब दो दिसंबर को सुना जाएगा मामला

Fri, 22 Nov 2024 07:13 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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सुलतानपुर से सपा उम्मीदवार के चुनाव के खिलाफ मेनका गांधी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई टाल दी। अब उनकी याचिका पर दो दिसंबर को शीर्ष कोर्ट सुनवाई करेगी। मेनका गांधी की याचिका पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ सुनवाई कर रही थी। 

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पीठ ने इस दौरान मेनका गांधी का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा से देरी की माफी के लिए आवेदन का पता लगाने और उसे रिकॉर्ड पर रखने के लिए कहा। देरी की माफी का मतलब अपील दाखिल करने के लिए निर्धारित समय सीमा को बढ़ाने के लिए अदालत की विवेकाधीन शक्ति से है।

मेनका गांधी ने सुलतानपुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के राम भुआल निषाद के चुनाव को चुनौती दी थी। 

बता दें कि इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में मेनका गांधी सपा उम्मीदवार राम भुआल निषाद से 43,174 वोटों के अंतर से हार गई थीं। इसके बाद उन्होंने निषाद के चुनाव को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 14 अगस्त को निषाद के चुनाव के खिलाफ उनकी चुनाव याचिका को खारिज कर दिया गया था, क्योंकि यह समय-बाधित थी। इसके बाद मेनका ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शीर्ष कोर्ट का रुख किया। 
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अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने माना था कि मेनका गांधी की याचिका 45 दिनों की समय सीमा के बाद दायर की गई थी। यह अवधि हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर करने की वैधानिक अवधि है। ऐसे में याचिका पर योग्यता के आधार पर सुनवाई नहीं की जा सकती।

गांधी ने दलील दी कि निषाद ने मतदाताओं को उनका पूरा आपराधिक इतिहास जानने के अधिकार से वंचित कर दिया है और इसलिए याचिका दायर करने में हुई देरी को माफ किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि निषाद के खिलाफ 12 आपराधिक मामले लंबित थे, लेकिन उन्होंने अपने हलफनामे में केवल आठ की जानकारी दी।

आसाराम की मेडिकल आधार पर जमानत की मांग पर गुजरात सरकार को सुप्रीम नोटिस
 
यौन उत्पीड़न मामले में मेडिकल आधार पर जमानत वाली आसाराम बापू की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया। जस्टिस एमएम सुंदरेश व जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि चूंकि यह पॉक्सो का मामला है इसलिए कोर्ट मेडिकल आधार पर इस पर विचार करेगा।

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वह ब्लॉकेज समेत कई बीमारियों से पीड़ित हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। इस मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम ने सजा के निलंबन और जमानत की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उनका दावा है कि वह मीडिया ट्रायल और उनके आश्रम पर नियंत्रण हासिल करने के उद्देश्य से की जा रही साजिशों का शिकार हैं। 86 वर्षीय आसाराम को दो दशक से भी पुराने आरोपों के आधार पर जनवरी 2023 में दोषी ठहराया गया था। आसाराम ने आरोप लगाया है कि उनकी सजा विसंगतियों से भरी हुई है और सिर्फ शिकायतकर्ता की अपुष्ट गवाही पर आधारित है। उनकी याचिका में कहा गया है कि आरोपों का समर्थन करने के लिए कोई चिकित्सा या स्वतंत्र सबूत नहीं है। आसाराम ने दावा किया कि उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने और उन्हें उनके आश्रम से बाहर निकालने के लिए उन्हें झूठा फंसाया गया है।

पीएम मोदी की सुरक्षा में चूक मामले में गवाहों के बयानों की मांग वाली पंजाब की याचिका खारिज
 सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2022 में पीएम मोदी की यात्रा के दौरान सुरक्षा उल्लंघन की जांच में गवाहों के बयान मांगने वाली पंजाब सरकार की याचिका खारिज कर दी। राज्य सरकार ने मामले की जांच कर रहीं सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा के समक्ष दी गई गवाही का ब्योरा मांगा था।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने पंजाब सरकार से कहा कि वह बयानों की सहायता के बिना दोषी अधिकारियों के खिलाफ स्वतंत्र रूप से जांच करे। शीर्ष अदालत ने सुरक्षा उल्लंघन की जांच के लिए 12 जनवरी, 2022 को पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। पीठ ने कहा, समिति की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद, मामले को 25 अगस्त, 2022 को लिया गया। रिपोर्ट की प्रति केंद्र और राज्य सरकार को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। यह निर्देश दिया गया कि रिपोर्ट को इस अदालत के महासचिव की सुरक्षित हिरासत में सीलबंद लिफाफे में रखा जाएगा। अब पंजाब सरकार ने गवाहों के बयान का ब्योरा मांगा है। पीठ ने कहा कि पंजाब सरकार की मांग पर विचार करने का कोई आधार नहीं दिखता।
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न्यायाधीश भी मनुष्य हैं, व्यक्तिगत आलोचना से बचना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि न्यायाधीशों की व्यक्तिगत आलोचना या निर्णयों में न्यायाधीशों के आचरण पर निष्कर्ष दर्ज करने से बचना चाहिए क्योंकि न्यायाधीश भी मनुष्य हैं और सभी मनुष्यों से गलतियां करने की प्रवृत्ति होती है।
जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सोनू अग्निहोत्री की अपील स्वीकार कर ली जिसमें अग्रिम जमानत याचिका पर विचार करते समय जांच अधिकारी और एसएचओ के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने के उनके आदेश के लिए उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी की गई थी।
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