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UP Nikay Chunav: मुस्लिम वोटों में बिखराव का किस पार्टी पर क्या असर, BJP का टिकट देने का प्रयोग कितना सफल रहा?

Mon, 15 May 2023 03:22 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इस चुनाव में भाजपा ने एक प्रयोग भी किया। ये प्रयोग मुसलमानों को लेकर किया गया था। इसी के तहत पार्टी ने पहली बार बड़े पैमाने पर मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे। आइए जानते हैं भाजपा के उस प्रयोग के बारे में। ये भी कि कैसे और कितना सफल हुआ ये प्रयोग? 
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मुसलमान और भाजपा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। भाजपा को बड़ी जीत मिली है। नगर निगम, नगर पालिका से लेकर नगर पंचायत तक के चुनावों में भाजपा के सबसे ज्यादा उम्मीदवार जीते हैं। सभी 17 नगर निगमों पर भाजपा का कब्जा हो गया। पार्षद की 1420 सीटों में से 813 पर भाजपा को जीत मिली है। 199 नगर पालिका अध्यक्ष सीटों में से 89 और 5327 नगर पालिका परिषद सदस्य की सीटों में से 1360 उम्मीदवार भाजपा के चुनाव जीते हैं। 
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कुछ इसी तरह का दबदबा नगर पंचायत चुनाव में भी देखने को मिला। सूबे में कुल 544 नगर पंचायत अध्यक्ष के पद हैं। इनमें से 191 पर भाजपा उम्मीदवारों को जीत मिली है। कुल 7177 नगर पंचायत सदस्यों की सीटों में से 1403 भाजपा के खाते में आए हैं। 

इस चुनाव में भाजपा ने एक प्रयोग भी किया। ये प्रयोग मुसलमानों को लेकर किया गया था। इसी के तहत पार्टी ने पहली बार बड़े पैमाने पर मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे। आइए जानते हैं भाजपा के उस प्रयोग के बारे में। ये भी कि कैसे और कितना सफल हुआ ये प्रयोग? 
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भाजपा ने क्या प्रयोग किया? 
इसी साल जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कहा, 'वोट की चिंता के बिना' संवेदनशीलता के साथ समाज के सभी वर्गों से रिश्ता जोड़ें।' इसी दौरान प्रधानमंत्री ने बोहरा और पसमांदा मुसलमानों का जिक्र किया। 

यूपी नगर निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पीएम मोदी के इसी फॉर्मूले पर काम किया। पहली बार एक साथ 395 मुसलमानों को निकाय चुनावों में टिकट दिया। इनमें से ज्यादा पसमांदा मुसलमान और महिला चेहरों को टिकट दिया। भाजपा द्वारा उतारे गए 395 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 41 को जीत मिली। इनमें से ज्यादातर मुसलमान महिलाएं और पसमांदा वर्ग से आते हैं।  
 

तो क्या अब 2024 में भी ये रणनीति अपनाएगी भाजपा? 
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'पसमांदा, बोहरा समाज के मुसलमानों के अलावा भाजपा का फोकस मुस्लिम महिलाओं पर है। भाजपा ने मुसलमानों के इन तीनों वर्ग के लिए काफी कुछ किया है। सरकारी योजनाओं का फायदा इन गरीब और पिछड़े वर्ग के मुसलमानों को भी मिला।'

प्रमोद कहते हैं, 'भाजपा ने मुसलमानों की पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने का काम शुरू किया है। इसकी जिम्मेदारी यूपी के अल्पसंख्यक मंत्री दानिश आजाद को दी गई है। निकाय चुनाव में खोज -खोजकर पिछड़े वर्ग के मुसलमानों को भाजपा ने टिकट दिया और इसका फायदा भी पार्टी को मिला। कई ऐसी सीटें इस बार भाजपा के कब्जे में आ गईं, जो पहले नहीं आती थीं।'

प्रमोद के अनुसार, निकाय तक तो अभी ठीक है, लेकिन फिलहाल विधानसभा और लोकसभा चुनाव में किसी मुसलमान को टिकट देने से भाजपा परहेज कर सकती है। ये तब तक ऐसा होगा जब तक पार्टी के पास पिछड़े वर्ग का कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा नहीं हो जाता। हां, अलग-अलग राज्यों के निकाय चुनाव में जरूर पार्टी इस तरह का प्रयोग करती रहेगी।
 
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मुस्लिम वोटों के बिखराव से क्या सिर्फ भाजपा को फायदा? 
2023 के विधानसभा चुनाव की तरह मुस्लिम वोटो एकमुश्त सपा के पक्ष में नहीं पड़े। इसका नुकसान सपा को हुआ। इसके साथ ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को इस बिखराव का फायदा मिला। 2017 में एआईएमआईएम के 12 निगम पार्षद थे। जो 2023 में बढ़कर 19 हो गए। 2017 में ओवैसी की पार्टी का एक भी नगर पालिका अध्यक्ष नहीं था। जबकि, इस बार पार्टी को तीन नगर पालिका अध्यक्ष पदों पर जीत मिली है। वहीं, सदस्यों की संख्या सात से बढ़कर 33 हो गई। नगर पंचायतों की बात करें तो यहां एआईएमआईएम के प्रदर्शन 2017 के मुकाबले खराब रहा। यानी, शहरों में ओवैसी की पार्टी को ज्यादा समर्थन मिला। जबकि गांवों में ये समर्थन घट गया।
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