जातिगत जनगणना बेशक अभी तक न हुई हो, लेकिन कहा यही जाता है कि उत्तर प्रदेश में करीब पचास फीसदी से ज्यादा पिछड़ी जातियों की आबादी है। यही वजह है कि ज्यादातर राजनीतिक दल पिछड़ों पर दांव लगाने के लिए आगे रहते हैं। लेकिन बारी जब टिकट देने की आई, तो अब तक दिए गए टिकटों में किसी भी पार्टी ने पचास फ़ीसदी टिकट पिछड़ों को नहीं दिए हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी ने अब तक घोषित प्रत्याशियों में सबसे ज्यादा टिकट ओबीसी को दिए हैं। जबकि बहुजन समाज पार्टी ने अब तक सबसे ज्यादा टिकट मुसलमानों को दिए हैं।
जबकि समाजवादी पार्टी ने 159 सीटें घोषित की हैं और उसमें 71 टिकट ओबीसी को दिए गए हैं। यानी सपा की अबतक घोषित कुल सीटों का 40 फ़ीसदी से ज्यादा का हिस्सा ओबीसी के खाते में गया है। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषक डॉ अशोक सिंह कहते हैं कि प्रदेश में जातिगत समीकरणों को साध कर ही चुनाव लड़ा जाता रहा है, और उत्तर प्रदेश में हमेशा से पिछड़ों को आगे रखे जाने की रवायत है। अब तक जिस तरह सीटों का वितरण हुआ है उसमें निश्चित तौर पर समाजवादी पार्टी ने पिछड़ों को न सिर्फ आगे रखा है, बल्कि जोड़-तोड़ की गुणा भाग में भी समाजवादी पार्टी ने पिछड़ों को अपनी पार्टी से जोड़ा है। हालांकि उनका कहना है आने वाले दिनों में भी बहुत सारे टिकट और प्रत्याशी घोषित होने बाकी हैं। लेकिन जो ट्रेंड दिख रहा है, उसमें थोड़ा बहुत ही फर्क हो सकता है। लेकिन एक बात तो बिल्कुल साफ है कि पिछड़ों को कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं छोड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में सवर्णों को टिकट देने के मामले में कांग्रेस ने अब तक सबसे ज्यादा टिकट दिए हैं। कांग्रेस ने अब तक 166 टिकट दिए हैं, जिनमें 58 टिकट सवर्णों को दिए गए हैं। जबकि दूसरे नंबर पर भारतीय जनता पार्टी ने अब तक घोषित 204 टिकट में 77 सवर्णों को दिए है। बीएसपी ने 111 सीटों में से महज 20 सीटें ही सवर्णों के लिए अभी तक घोषित की हैं। राजनैतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं कि कांग्रेस ने कोशिश तो सोशल इंजीनियरिंग जैसी की है, लेकिन उनके जनाधार को देखते हुए यह गणित कितनी काम आएगी यह कहना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने जनरल और ओबीसी को बराबर टिकट देकर बहुत कुछ राजनीतिक गणित साधने की कोशिश की है। वे कहते हैं कि शुरुआती दौर में उत्तर प्रदेश में ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां ब्राह्मणों को एकजुट करने में जुटी थी, लेकिन जब टिकट देने की स्थितियां आती हैं तो ब्राह्मणों को उस स्तर पर टिकट नहीं मिल पाते हैं।
बहुजन समाज पार्टी ने इस बार फिर से मुस्लिमों पर अब तक सबसे ज्यादा दांव लगाया है। बसपा की अबतक घोषित 111 सीटों में से 40 मुस्लिमों को दिया गया है। जबकि 19 टिकट एससी और एसटी को मिले हैं। इसी तरह समाजवादी पार्टी ने 159 घोषित सीटों में से 31 मुस्लिमों को और इतने ही एससी एसटी को टिकट देकर राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की है। कांग्रेस ने 166 घोषित उम्मीदवारों में से 28 मुस्लिम प्रत्याशी घोषित किए हैं। जबकि 39 एससी-एसटी कैटेगरी से उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है। भारतीय जनता पार्टी ने अब तक एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है और 43 एससी एसटी को चुनाव के मैदान में उतारा है।
उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार प्रद्युम्न मिश्र का कहना है कि जातिगत समीकरण को साधकर सभी राजनीतिक पार्टियां चुनावी मैदान में उतरी हुई हैं। भाजपा ने जहां सवर्णों के साथ मिलकर ओबीसी को साधने की कोशिश की है, वहीं समाजवादी पार्टी ने ओबीसी पर सबसे बड़ा दांव लगाया है। बहुजन समाज पार्टी ने मुसलमान और ओबीसी पर अपना दांव लगाकर इस बार चुनावी मैदान में उतरने की योजना बनाई है। मिश्र के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी को इस बात का एहसास है कि उनका कोर वोट बैंक दलित उनके साथ तो है ही। कांग्रेस ने इस बार सोशल इंजीनियरिंग का दांव खेला है। अब तक घोषित टिकट में कांग्रेस ने सवर्ण, ओबीसी और दलितों को खासी तवज्जो दी है।