यूपी विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के लिए सोमवार को पश्चिमी क्षेत्र के नौ जिलों की 55 सीटों पर मतदान खत्म हुआ। इस चरण में रामपुर की विधानसभा सीट भी शामिल है जहां से समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान चुनाव लड़ रहे हैं। इस समय जेल में बंद आजम खान के चुनाव प्रचार की कमान उनकी पत्नी तंजीन फातिमा ने संभाल रखी है। तंजीन फातिमा ने कहा है कि आजम खान जनता के दिलों में रहते हैं और उनकी जीत पक्की है। हालांकि, सपा नेता मुस्लिम और दलित-पिछड़े मतदाताओं में अच्छी पकड़ रखने वाले अपने इस दिग्गज की कमी महसूस कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि आजम खान होते तो चुनाव प्रचार में बिल्कुल अकेले पड़ रहे अखिलेश यादव को एक बड़ा साथ मिल गया होता और उनकी राह ज्यादा आसान हो जाती। लेकिन उनके जेल में बंद होने से ऐसा नहीं हो पा रहा है। पार्टी को अनुमान है कि उसे इसका नुकसान भी हो सकता है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आईपी सिंह ने अमर उजाला से कहा कि यह दुर्भाग्य की बात है कि रिकॉर्ड नौ बार विधायक और दो बार सांसद रहे आजम खान को फर्जी मामलों में एफआईआर दर्ज कर जेल में डाल दिया गया है और उन्हें जमानत नहीं दी जा रही है। वहीं, लखीमपुर खीरी में दिन-दहाड़े चार-चार किसानों की हत्या करने वाले एक केंद्रीय मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा को चार महीने के अंदर जमानत पर रिहा कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जनता खुली आंखों से यह ‘अत्याचार’ देख रही है और वह मतदान के जरिए इसका सही जवाब भी देगी। सपा नेता ने दावा किया कि केवल रामपुर ही नहीं, बल्कि आजम खान का असर पूरे उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय में है और सपा को इसका लाभ मिलेगा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान समुदाय के मतदाताओं की अच्छी-खासी आबादी निवास करती है। सोमवार को जिन 55 सीटों पर मतदान हुआ, इसमें मुसलमान समुदाय के मतदाताओं की संख्या 37 फीसदी तक है। दलित मतदाता भी इन सीटों पर 25 फीसदी तक की मजबूत हिस्सेदारी रखते हैं। यदि मुस्लिम और दलित मतदाता किसी भी पार्टी के पक्ष में मुड़ जाएं तो इन सीटों पर उसकी विजय आसान हो जाती है। इन समीकरणों को देखते हुए ही समझा जा सकता है कि मायावती ने यहां सबसे ज्यादा मुसलमान उम्मीदवार उतारे हैं।
2007 में यही बेल्ट उनके लिए सत्ता के द्वार खोलने वाली साबित हुई थी। 2012 में सपा ने इस बेल्ट में अच्छी बढ़त हासिल की थी। सपा नेताओं का दावा है कि मायावती के कमजोर होने से यह समीकरण एक बार फिर 2012 की तर्ज पर उनके पक्ष में पलट सकता है और उसकी दावेदारी मजबूत हो सकती है। सपा नेताओं का दावा है कि इस चरण में वे 50 सीटों तक पर जीत हासिल कर सकते हैं।
हालांकि सपा की राह इतनी आसान भी नहीं रहने वाली है क्योंकि भाजपा का दावा है कि बसपा के कमजोर होने से गैर-जाटव दलित समुदाय उसके साथ आ गया है, जिसके कारण उसे इस चरण में भारी बढ़त हासिल होगी। पार्टी का दावा है कि जिस प्रकार 2017 के चुनाव में उसने इस चरण की 38 सीटों पर जीत हासिल की थी, गैर-जाटव दलितों के सहारे वह यह करिश्मा एक बार फिर दोहराने में कामयाब रहेगी।