उत्तर प्रदेश चुनाव: संकल्प पत्र 2022 जारी करते भाजपा पदाधिकारी
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घोषणा पत्रों से नहीं प्रभावित होते वोटर!
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने कहा कि उनका निजी तौर पर उनका मानना है कि जनता घोषणा पत्र में किए गए वादों से बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं होती है। घोषणा पत्र जारी करने की कई महीने पहले से ही चुनाव प्रचार शुरू हो जाता है और लगभग उसी समय जनता किसे वोट देना है, इस पर अपना अंतिम मन बना चुकी होती है। उन्होंने कहा कि यदि केवल घोषणा पत्रों से चुनाव जीते जाते तो मायावती कभी उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री नहीं बन पातीं क्योंकि बसपा कभी घोषणा पत्र नहीं जारी करती।
बहुत सीमित संख्या में ही ऐसे मतदाता होते हैं जो चुनाव के अंतिम क्षणों में अपना मत निर्धारित करते हैं। ऐसे में उन्हें नहीं लगता कि इन घोषणा पत्रों का कोई बहुत बड़ा असर मतदाताओं के ऊपर पड़ता है। क्योंकि इन घोषणा पत्रों की कोई वैधानिक बाध्यता नहीं होती, इसलिए राजनीतिक दल चुनाव के बाद इन मुद्दों को भूल जाते हैं, इसलिए इसे एक गलत परंपरा समझकर रोक देना चाहिए।
दक्षिण भारत के राज्यों से शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे यह उत्तर भारत के राज्यों में फैलती जा रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार अपनी कर्ज लेने की क्षमता लगभग खो चुके हैं। कोई आय न होने के बाद भी मुफ्त योजनाओं की घोषणा करना देश के आर्थिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। आमदनी की कोई ठोस योजना न होने के बाद भी राजनीतिक दल भारी-भरकम घोषणाएं कर जनता को छलने का कार्य करते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी वर्ग विशेष को मुफ्त की योजनाएं देकर जनता की विशेष वर्ग पर टैक्स की का भार डाला जाता है। यह एक गलत परंपरा है। जब तक अपने वायदों पर खरा उतरने की कोई वैधानिक बाधता नहीं तय की जाती राजनीतिक दलों को इस तरह की घोषणाएं करने से सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को रोक लगाने के बारे में विचार करना चाहिए।
इसकी बजाय राजनीतिक दलों को शिक्षा और स्वास्थ्य पूरी तरह से नि:शुल्क करने और इनकी विश्वस्तरीय गुणवत्ता देने की योजना पेश करनी चाहिए, जिसका लाभ समाज के सभी वर्गों को पूरी तरह उपलब्ध होना चाहिए। यदि सभी नागरिकों को स्वास्थ्य और शिक्षा की चिंता से मुक्त कर दिया जाए तो वह बाकी की चीजें अपने स्तर पर प्राप्त कर सकते हैं और सरकारों पर इसका बोझ नहीं पड़ेगा।