निकाय चुनाव के दौरान चर्चा थी कि कांग्रेस मथुरा की सीट निकाल सकती है। पार्टी यहां से अपने मजबूत उम्मीदवार राजकुमार रावत को चुनाव लड़ाना चाहती थी, लेकिन अंतिम समय में दूसरे उम्मीदवार को पार्टी का सिंबल जारी कर दिया और वह कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़ा। हालांकि, पार्टी ने रावत के पक्ष में ही चुनाव प्रचार किया।
लेकिन पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ने वाले और पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी में अंतर होने के कारण मतदाताओं में गलतफहमी पैदा हुई और पार्टी मथुरा की सीट हार गई। चूंकि प्रदेश अध्यक्ष के हस्ताक्षर के बाद ही सिंबल जारी होते हैं, ऐसे में अंतिम समय में किसी अनाधिकारिक प्रत्याशी को सिंबल कैसे जारी हो गया, इसको लेकर बृजलाल खाबरी पर अंगुली उठी थी।
केंद्र की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे
दरअसल कांग्रेस अपने पारंपरिक मतदाताओं दलितों और मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है, जिससे वह आने वाले चुनावों में मजबूत लड़ाई लड़ सके। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र में मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था। देश में उत्तर प्रदेश के सियासी कद को देखते हुए पार्टी ने यूपी में भी दलित समुदाय के व्यक्ति बृजलाल खाबरी को अध्यक्ष बनाया था।
पार्टी को अनुमान था कि उनके आने से यूपी के दलित और मुसलमान तेजी से पार्टी से जुड़ेंगे और पार्टी अपनी जड़ों को मजबूत कर सकेगी। लेकिन फिलहाल अक्तूबर 2022 में उनके अध्यक्ष बनने के बाद से, अब तक वे दलित या मुसलमान समुदाय के लोगों को पार्टी से जोड़ने का कोई प्रभावशाली कार्य नहीं कर सके हैं। इस कारण भी पार्टी आलाकमान उन्हें लेकर असहज बताया जा रहा है। उनके पार्टी हाईकमान से मुलाकात के बाद यूपी में नए राजनीतिक समीकरण पैदा होने की संभावना जताई जा रही है।