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यूपी के नतीजे: बसपा के राजनीतिक अस्तित्व पर संकट, दलितों का वोट भी नहीं मिल रहा मायावती को 

Thu, 10 Mar 2022 08:54 PM IST
Amit Mandal आशीष तिवारी, नई दिल्ली।

सार

विधानसभा के चुनावों में मायावती की बसपा का जो हश्र हुआ है वह अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। पार्टी महज एक सीट पर सिमट रही है। 
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  
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मायावती - फोटो : फाइल फोटो
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कभी दलितों की राजनीति में सबसे आगे रहने वाली मायावती और उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी के अस्तित्व पर ही फिलहाल संकट नजर आ रहा है। गुरुवार को आए नतीजों से एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि बहुजन समाज पार्टी के कोर वोट बैंक में सेंध लगनी शुरू हो गई है। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीते आठ सालों में बहुजन समाज पार्टी का लगातार न सिर्फ ग्राफ गिरता जा रहा है बल्कि अपना वोट बैंक संभालना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में फिलहाल बहुजन समाज पार्टी और मायावती कि राजनीतिक अस्तित्व पर ही संकट के बादल नजर आ रहे हैं।

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2007 में किया था क्लीन स्वीप
2007 के विधानसभा चुनावों में बसपा ने जिस तरीके से उत्तर प्रदेश में क्लीनस्वीप करते हुए पूर्ण बहुमत से अपनी सत्ता पाई थी उस वक्त यह बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि कुछ सालों के भीतर बहुजन समाज पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही होगी। 2022 के नतीजों में बहुजन समाज पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई है और पूरे उत्तर प्रदेश में उसका वोट शेयर भी गिरकर 13 फीसदी के करीब रह गया। राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी दलितों के 22 फीसदी वोट की दावेदारी शुरुआत से करती आई है। वह कहते हैं अगर 2022 के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी का 9 फीसदी वोट शेयर कम हुआ है तो यह पार्टी के लिए बहुत कुछ खोने जैसा है। वो कहते हैं दरअसल पार्टी का अपना कोर वोट बैंक ही खुद को पार्टी में महफूज नहीं मान रहा है। यही वजह है कि उसका वोट शिफ्ट होना शुरू हो गया।है।  

2012 चुनावों के बाद से गिरना शुरू हुआ ग्राफ
राजनीतिक विश्लेषक ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ 2012 के विधानसभा चुनावों के बाद से गिरना शुरू हुआ। 2014 के लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी का जिस तरीके से सूपड़ा साफ हुआ वह न सिर्फ बसपा बल्कि राजनैतिक गलियारों में सबको अविश्वसनीय सा लगा था। ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि अंदाजा ही लगाया जा रहा था कि लोकसभा के प्रदर्शन के बाद बहुजन समाज पार्टी अपना राजनीतिक कद बड़ा करेगी लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में तो और भी बुरा हाल रहा। 2017 के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी को 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा। जबकि उसे ठीक पहले के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी पूर्ण रूप से सत्ता में आई थी। ओपी मिश्रा कहते हैं इस दौरान भी बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक उतना कम नहीं हुआ था लेकिन 2022 में तो हालात पूरी तरीके से बिगड़ गए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2017 और 2022 के बीच में जब 2019 का लोकसभा चुनाव आया तो बसपा को 0 से 10 सीटें मिल गयीं। उनका कहना है यह सीटें बसपा को समाजवादी पार्टी गठबंधन के चलते मिली थी। 
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2007 में सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लिया था
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बहुजन समाज पार्टी अपने उसी अंदाज में आगे बढ़ती रही जिस अंदाज में उसके 2007 में सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लिया था। राजनैतिक विशेषज्ञ शंकर सिंह का कहना है कि तब तक वक्त बदल चुका था। भारतीय जनता पार्टी बहुत ही आक्रामक तरीके से आगे बढ़ रही थी। भारतीय जनता पार्टी की नीतियां जिस तरीके से सबको प्रभावित कर रही थी उसमें सबसे बड़ा तबका बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक ही था। सिंह कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी को इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं हुआ कि कैसे धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी ने उसके पैरों के नीचे की जमीन की खींचनी शुरू कर दी। वो कहते हैं 2022 के आंकड़े बिल्कुल स्पष्ट है कि बहुजन समाज पार्टी का अपना वोट बैंक भारतीय जनता पार्टी की ओर शिफ्ट होना शुरू हुआ है। बसपा शुरुआत से दलितों के 22 फीसदी वोट को अपना वोट बैंक मानकर चलती थी। लेकिन 2022 में उसको मिले तकरीबन 13 फीसदी वोट इस बात का इशारा करते हैं कि उसके 9 फ़ीसदी वोट बैंक में जबरदस्त सेंध मारी हुई है। 

भाजपा की ओर खिसका वोट बैंक
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस नौ फीसदी वोट बैंक भाजपा की ओर बढ़ा है। राजनैतिक विश्लेषक प्रेम कहते हैं कि मायावती अपने मूल वोट बैंक को संभाल नहीं पा रही हैं। क्योंकि 2022 के आए नतीजे और वोट प्रतिशत इस बात का इशारा करते हैं कि कुछ जगहों पर बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को ठीक-ठाक वोट मिला है। यानी कि बसपा को जो 13 फीसदी वोट मिला है वह सिर्फ दलितों का ही नहीं बल्कि मुस्लिम और दूसरे अन्य समुदायों का भी है। प्रेम कहते हैं कि ऐसे में संदेश स्पष्ट है कि मायावती का एक बड़ा वोट बैंक अपना ठिकाना दूसरी राजनीतिक पार्टियों में तलाश कर रहा है। ठिकाने के तौर पर भारतीय जनता पार्टी मायावती के वोटरों की पहली पसंद बन रही है।

नतीजे बसपा के लिए चौंकाने वाले 
बसपा से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि जो परिणाम 2022 के विधानसभा चुनावों में गुरुवार को आए हैं वह निश्चित तौर पर पार्टी के लिए बिल्कुल चौंकाने वाले हैं। बसपा के वरिष्ठ नेता का कहना है कि बहुजन समाज पार्टी को अपने अस्तित्व के लिए अपने कोर वोटर के लिए अब मैदान में आना ही होगा। उनका कहना है कि पार्टी ने जिस तरीके से कुछ चुनिंदा लोगों को अपनी पूरी ताकत दे दी है उससे पार्टी का सिर्फ नुकसान ही होना है। इसके सिवा और कुछ नहीं। इसलिए बेहतर यही है कि पार्टी को अपने उस मिशन को वापस लाने के लिए कुनबे में से निकलकर अन्य राजनीतिक दलों की तरह मैदान में निकलना होगा। बसपा के नेता मानते हैं कि 2007 के दौर की राजनीति का वक्त अब नहीं है। उनका कहना है कि उस वक्त जो राजनीतिक दल मैदान में थे वह भी पुराने थे और अपने पुराने ढर्रे पर ही राजनीति प्रचार-प्रसार भी करते रहते थे। लेकिन अब बदले हुए वक्त में सभी समीकरणों को साधते हुए ही आगे बढ़ना होगा। 

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