दो साल पहले लद्दाख में भारत व चीनी सैनिकों के बीच गलवान घाटी में हुए संघर्ष की कुछ अनकही गाथाएं अब सामने आई हैं। गलवान संघर्ष पर प्रकाशित पुस्तक 'आजादी के अमृत महोत्सव' के मौके पर हमारे वीर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान का स्मरण दिला रही हैं। इसमें चीनी सेना की चालबाजियों व क्रूरता के उदाहरण और भारत के वीरों के अदम्य शौर्य, पराक्रम व सेवा की मिसाल हैं। इसमें कहा गया है कि नायक दीपक सिंह तब वीरगति को प्राप्त हुए थे, जब वे संघर्ष में जख्मी चीनी सैनिकों को मरहम लगा रहे थे। इस पर भी ड्रैगन की फौज ने उन्हें नहीं बख्शा था।
15 जून 2020 को गलवान घाटी में हुए संघर्ष ने पूरी दुनिया का ध्यान खिंचा था। इसके बाद भारत व चीन के कई दशकों के शांतिपूर्ण रिश्तों में पैदा हुआ तनाव अब भी कायम है। दोनों देशों के हजारों सैनिक लद्दाख में मोर्चे पर डटे हैं। गलवान संघर्ष के भारतीय नायकों पर हाल ही में एक पुस्तक 'India’s Most Fearless 3' लिखी है। इसका विमोचन स्वतंत्रता दिवस पर होने जा रहा है। पुस्तक पत्रकार राहुल सिंह और शिव अरूर ने लिखी है।
चीन ने नहीं बताई मृत चीनी जवानों की सही संख्या
गलवान संघर्ष में कर्नल बी. संतोष बाबू समेत 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। चीन को भी भारी जनहानि हुई थी, लेकिन सचाई छिपाने की उसकी आदत के चलते उसने आज तक उसके मृत सैनिकों की सही संख्या नहीं बताई है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में भारत के उन जांबाजों की अनकही कहानियां हैं, जिन्होंने इस संघर्ष में अंतिम सांस तक साहस, शौर्य व राष्ट्र सेवा का प्रदर्शन किया। ये वीर गाथाएं उन जवानों की जुबानी हैं, जो इस लड़ाई के वक्त मौके पर मौजूद थे और जिन्होंने भारत के लिए अपनी जान की बाजी लगाते हुए चीनी फौज के दांत खट्टे कर दिए थे।
30 से ज्यादा भारतीय सैनिकों की जान बचाई
ऐसे ही एक नायक दीपक सिंह थे। उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े सैन्य सम्मान 'वीरचक्र' से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। उनकी पत्नी रेखा सिंह ने तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से यह पुरस्कार प्राप्त किया था। रेखा सिंह मप्र के रीवा की हैं। वह भी पति के पदचिंहों पर चलते हुए सेना में शामिल हो गई हैं।
नायक दीपक सिंह ने इस रणभूमि में 30 से ज्यादा भारतीय सैनिकों की जान बचाई थी। उन्होंने संघर्ष में जख्मी चीनी सैनिकों की भी जान बचाई थी, यह बात अब उजागर हुई है। चीनी फौज ने उन पर नृशंस हमला किया था। नायक दीपक सिंह सेना में चिकित्साकर्मी के रूप में तैनात थे। रणभूमि में वे घायल सैनिकों के उपचार में जुटे हुए थे। इस दौरान उन्होंने भारतीय सैनिकों के साथ ही मानव धर्म निभाते हुए चीन के जख्मी सैनिकों का भी प्राथमिक उपचार किया था।
पुस्तक में कहा गया है कि जब नायक दीपक घायल चीनी सैनिकों की मरहम पट्टी कर रहे थे, तभी एक पत्थर आकर उनके सिर पर लगा और वे बुरी तरह लहूलुहान हो गए। तभी एक मेजर ने अपने मेगाफोन से चीनियों को ललकारा वो एक प्राथमिक इलाज करने वाले सैन्यकर्मी का निशाना बना रहे हैं, लेकिन ड्रैगन की फौज का दिल नहीं पसीजा और दीपक सिंह चीनी फौज से लड़ते हुए वीरगति का प्राप्त हो गए।
जिंदा बचे चीनी सैनिकों को दीपक सिंह को शुक्रिया कहना चाहिए : कर्नल रवि कांत
पुस्तक के लेखकों से कर्नल रविकांत ने कहा- 'मैं केवल इतना कह सकता हूं कि उस रात जीवित बचे घायल चीनी सैनिकों को नायक दीपक सिंह को शुक्रिया कहना चाहिए। चीनी सेना ने तो उन्हें एक तरह से लावारिस छोड़ दिया था, जबकि हमारा यह लड़का उनके जख्मों पर मरहम लगा रहा था। हमें देश की रक्षा के लिए जान लेने की ट्रेनिंग दी जाती है, लेकिन जान बचाने से बढ़कर क्या हो सकता है?' कर्नल रविकांत को कर्नल संतोष बाबू की शहादत के बाद सेना की 16 बिहार रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर बनाया गया था। उन्होंने कहा कि हम बता सकते हैं कि नायक दीपक सिंह ने कितने भारतीय सैनिकों की जान बचाई, लेकिन यह नहीं बता सकते कि उस रात उन्होंने कितने चीनी सैनिकों को बचाया था।