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बलराज मधोक, जब खरी-खरी कहने पर आडवाणी ने किया पार्टी से बाहर

Mon, 02 May 2016 10:03 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक और जनसंघ के संस्‍थापक सदस्य रहे बलराज मधोक का आज 96 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। कश्मीर के अक्सादू में 1920 में जन्में बलराज की गिनती जनसंघ और आरएसएस के शीर्ष नेताओं में होती थी। 
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श्रीनगर के पीजीडीएवी कालेज में प्रोफेसर रहे मधोक जीवन भर सिद्घांतों की राजनीति करते रहे। न वह खरी-खरी बोलने में हिचकते थे न किसी के सामने अपनी बात रखने में। अपने इस बेबाक अंदाज के कारण ही एक बार उन्हें उस जनसंघ से निकाल दिया गया था जिसके वो संस्‍थापक सदस्य रहे थे। बाद में वह जनसंघ के अध्यक्ष भी बने और उनके नेतृत्व में पार्टी ने देशभर में 35 सीटें भी जीतीं।

कश्मीर में जन्मे बलराज मधोक की शुरूआती शिक्षा लाहौर से हुई। यहां शिक्षण के दौरान ही वह आरएसएस के संपर्क में आए और 18 वर्ष की उम्र में संघ प्रचारक बने। धीरे धीरे उनका कद आरएसएस में बढ़ता रहा। 1942 में उन्हें जम्‍मू कश्मीर में आरएसएस की जिम्मेदारी सौंपी गई। 
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यहां से पचास के दशक के अंत में वो दिल्‍ली वापस लौट आए। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में जब भारतीय जनसंघ की स्‍थापना की तब मधोक उनके संपर्क में आए और पार्टी के प्रचार और विकास में हाथ बंटाया। उन्हें पार्टी का संस्‍थापक सचिव बनाया गया। 

पार्टी विरोधी गति‌विधियों के आरोप में पार्टी से निकाले गए थे

मुखर्जी ने बंगाल में जनसंघ की इकाई स्‍थापित की तो दिल्‍ली और पंजाब में पार्टी को बढ़ाने का काम मधोक को सौंपा गया। उन्होंने दोनों जगह जनसंघ की राज्य इकाई की स्‍थापना की। इसी साल मधोक ने आरएसएस की छात्र इकाई एबीवीपी की स्‍थापना भी की। 

इसके बाद मधोक निरंतर बढ़ते रहे साल 1966 में उन्हें भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष बना दिया गया। उन्हीं के नेतृत्व में पहली बार पार्टी ने देशभर में चुनाव लड़ा और 35 सीटें जीतीं। वह खुद भी दूसरी बार दिल्‍ली से सांसद बने। इसी के बाद ही जनसंघ की विपक्षी दल के तौर पर पुख्ता पहचान बनी। 

इमरजेंसी के दौर में जब सभी विपक्षी नेताओं को जेल में डाला जा रहा था तब 18 महीने के लिए उन्हें भी जेल की हवा खानी पड़ी। कहा जाता है कि अपनी बेबाक छवि के कारण उनकी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से नहीं बनती थी, उनमें से एक लालकृष्‍ण आडवाणी भी थे। 

यही कारण है कि जिस जनसंघ की स्‍थापना और उसे बढ़ाने में उनका खास योगदान रहा एक दिन उसी से उन्हें निकाल दिया गया। साल 1973 में जब लालकृष्‍ण आडवाणी जनसंघ के अध्यक्ष बने तब उनके सामने कानपुर में हुई सभा में मधोक ने संगठन मंत्रियों को हटाकर जनसंघ की कार्यप्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की मांग उठाई थी। 
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अंत तक गुमनामी का जीवन जीते रहे मधोक

मधोक का मानना था कि जनसंघ पर आरएसएस का असर ज्यादा बढ़ता जा रहा है। उनकी यह बात वरिष्ठ नेताओं को अखर गई, कहते हैं उनकी बातों से आडवाणी इस कदर नाराज हुए कि उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों और अनुशासन तोड़ने के आरोप में बाहर कर दिया गया। 

इस घटना ने मधोक को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद वह कभी वापस नहीं लौटे। हालांकि 1973 में उन्होंने एक बार भारतीय जनसंघ के नाम से अलग पार्टी बनाकर राजनीतिक वजूद बनाए रखने का प्रयास भी किया लेकिन काफी प्रयास के बाद भी वह सफल नहीं हो सके। 

मधोक दावा करते थे कि उन्होंने ही राम मंदिर की मांग को पहली बार आवाज दी थी। उन्होंने राम मंदिर को हिंदुओं को सौंपने की मांग की थी, 1968 में उन्होंने लोकसभा में भी इसकी आवाज उठाई थी। 

मधोक की बदकिस्मती रही कि जनसंघ के भाजपा में परिवर्तन के बाद जहां उस दौर के सभी नेताओं ने शिखर को छुआ वहीं उनकी राजनीतिक हस्ती पर गुमनामी की गर्त बढ़ती चली गई।
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