26 नवंबर से शुरू हुए किसान आंदोलन को 76 दिन हो गए हैं। तब से अब तक किसानों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत के 11 दौर बीत चुके हैं, लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं निकल सका है। किसान नेताओं का आरोप रहा है कि केंद्र सरकार उन्हें केवल तारीख पर तारीख दे रही है और समाधान निकालने की कोई कोशिश नहीं कर रही है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि उसने किसान नेताओं के सामने कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किए हैं, लेकिन किसान नेता सहमत नहीं हो रहे हैं। सरकार का यह भी आरोप है कि आंदोलन में शामिल कुछ लोगों के कारण किसानों और सरकार के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।
पीयूष गोयल ने कहा कि देश में 86 फीसदी किसानों के पास दो हेक्टेयर से भी कम कृषि भूमि है। नए कृषि कानूनों का सबसे बड़ा फायदा इन्हीं छोटे-छोटे किसानों को होगा। ऐसे में अगर कुछ बड़े किसान इस कानून से सहमत नहीं हैं तो भी बाकी किसानों के बड़े लाभ को देखते हुए सरकार इस कानून को बनाए रखने पर विचार कर रही है। किसानों से बातचीत में अहम भूमिका निभा रहे पीयूष गोयल ने संकेत दिया है कि सरकार कानूनों को पूरी तरह वापस लेने के पक्ष में नहीं है।
आढ़ती किसान संघर्ष कमेटी, पंजाब के नेता रविंदर सिंह चीमा ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों के सामने अभी तक जो भी प्रस्ताव रखे हैं, वे किसानों की मांगों से अलग रहे हैं। यही कारण है कि अनेक प्रस्तावों के बाद भी अभी तक दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई है। किसानों की सबसे बड़ी मांग यह रही है कि केंद्र सरकार कृषि मामलों पर दखल न दे। यह राज्यों का विषय है और वह इसे राज्यों के ऊपर ही छोड़ दे कि वे अपने राज्यों में कृषि के लिए कौन सा मॉडल अपनाना चाहते हैं।
अगर केंद्र सरकार कृषि विषयों पर कानून बनाने की बात से पीछे हटना स्वीकार करे तो उनके बीच बातचीत बन सकती है। किसान नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री की अपील को वे बेहद सकारात्मक तरीके से ले रहे हैं और वे भी चाहते हैं कि इस मामले का जल्दी से कोई समाधान निकले। लेकिन इसके लिए सरकार को पहल करनी पड़ेगी।
चीमा का कहना है, 15 फरवरी को पंजाब के मोगा में किसानों की एक खुली महापंचायत होगी। इस महापंचायत में सरकार के साथ बातचीत के बिदुओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इसमें संशोधित प्रस्ताव भी सामने आ सकते हैं, लेकिन इसके बाद भी बातचीत को सफल बनाने की जिम्मेदारी सरकार पर ही रहेगी क्योंकि उसे ही ऐसे प्रस्तावों पर मुहर लगानी है जिस पर सहमति बन सकती है।
किसान नेता ने कहा कि महापंचायत में अनेक प्रकार के विचार सामने आते हैं। इनमें कई बार आपस में भी सहमति नहीं होती है, लेकिन कोई भी निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है। इसलिए अगर सरकार को लग रहा है कि किसानों के बीच कुछ ऐसे लोग हैं जो बातचीत को सफल नहीं होने देना चाहते हैं, तो भी अगर सरकार के प्रस्ताव ज्यादातर किसान संगठनों को ठीक लगते हैं तो बहुमत के आधार पर उससे सहमति की घोषणा की जा सकती है।