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सुप्रीम कोर्ट: केंद्रीय गृह सचिव ने सीएपीएफ में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को सही ठहराया, 18 नवंबर को होगी सुनवाई

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केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने सीएपीएफ में जारी आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को सही ठहराया है। आतंकवाद, विद्रोह  और उग्रवाद से निपटने एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य पुलिस/केंद्रीय सशस्त्र बलों (सीएपीएफ) के बीच तालमेल के लिए आईपीएस व सेना की प्रतिनियुक्ति बहुत जरूरी है। सरकार, सीएपीएफ की अलग पहचान और ऑपरेशनल क्षमता को बनाए रखने के लिए आईपीएस की मौजूदगी को आवश्यक मानती है। 

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सोमवार को सुप्रीम कोर्ट आदेश के दो सितंबर के आदेशों के अनुपालन में केंद्रीय गृह सचिव द्वारा दिए गए शपथ पत्र में यह बात कही गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना केस की देरी को माफ करते हुए यह नोटिस जारी किया है कि अगली सुनवाई में भारत के अटॉर्नी जनरल मौजूद रहें। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी। 

दो सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था 
सर्वोच्च अदालत ने दो सितंबर को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (सीएपीएफ) के कैडर अफसरों के 'संगठित समूह 'ए' सेवा' (ओजीएएस) मामले में अवमानना केस की सुनवाई करते हुए कहा था, 'यह मानना गलत है कि सीएपीएफ में नेतृत्व करने के लिए सक्षम अधिकारी नहीं हैं। सीएपीएफ अधिकारी देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं। उनके पास 30 साल का अनुभव है, ऐसे में उन्हें अलग नहीं माना जा सकता। सरकार की तरह न्यायपालिका को भी उनकी चिंता है। कैडर अफसरों के मामले को लेकर सर्विस रूल्स में क्या बदलाव किया गया है, पूरा रोडमैप क्या है। 23 मई 2025 का फैसला लागू करने के लिए सरकार ने अभी तक क्या किया है। इस बाबत केंद्रीय गृह सचिव दो सप्ताह में जवाब दें। सर्वोच्च अदालत ने खुद इस मामले की निगरानी करने का संकेत दिया था। 
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केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) एक्ट, 2026 की दूसरी अनुसूची में विभिन्न केंद्रीय बलों के अपने एक्ट को रखा गया है। इसके सेक्शन 3 में कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास यह पावर है कि जब उसे सुविधा होगी, वह दूसरी अनुसूची में जो एक्ट हैं, उनमें बदलाव कर सकती है। जब तक बदलाव नहीं होता, तब तक उन एक्ट के मुताबिक बलों का कामकाज चलता रहेगा। जानकारों के अनुसार, इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि निकट भविष्य में सरकार द्वारा इन बलों के अपने एक्ट में बदलाव किए जाने की संभावना है। ऐसा भी हो सकता है कि सरकार, इन सभी बलों को एक ही एक्ट के अंतर्गत ले जाए। केंद्रीय गृह सचिव ने अपने जवाब में सीएपीएफ के नए एक्ट का जिक्र किया है। 

सीएपीएफ के नए एक्ट के सेक्शन 2 (ई) में 'ग्रुप ए सामान्य ड्यूटी अफसर' की परिभाषा दी गई है। इसमें लिखा है कि आईपीएस, आर्मी अफसर और दोबारा से रोजगार पाने वाले व्यक्ति, सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति पर आ सकते हैं। दूसरे अफसर जो तय नियमों के अनुसार भर्ती होते हैं, वे भी इन बलों में प्रतिनियुक्ति ले सकते हैं।  सीएपीएफ एक्ट के सेक्शन 3 में कहा गया है कि न्यायालय का फैसला, डिक्री या कोई अन्य आदेश, जो समय समय पर जारी होता है, उसका कोई असर इस एक्ट पर नहीं पड़ेगा। केंद्र सरकार, नोटिफिकेशन के द्वारा सीएपीएफ के लिए रूल बना सकती है। अफसरों की भर्ती, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति या सेवा की शर्तें, सरकार इन्हें नोटिफिकेशन द्वारा तय कर सकती है। यह निर्णय, किसी भी अदालती फैसले या डिक्री से प्रभावित नहीं होगा। यहां पर सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति भी काम नहीं करेगी। 

सीएपीएफ के कैडर अफसरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्रीय गृह सचिव (प्रतिवादी संख्या 1) गोविंद मोहन द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे का मुख्य बिंदु, कोर्ट के पहले के आदेश के बावजूद सीएपीएफ में आईपीएस अधिकारियों की चल रही प्रतिनियुक्ति को सही ठहराना है। सर्वोच्च अदालत ने अपने 23 मई 2025 के आदेश में इस प्रतिनियुक्ति को सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) स्तर तक धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया गया था। इसका मकसद, कैडर अफसरों के लिए प्रमोशन के मौके बेहतर बनाना था। सर्वोच्च अदालत में सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि मई 23 2025 के फैसले के बाद भी 46 आईपीएस अधिकारियों को पांच बलों (बीएसएफ: 13, सीआईएसएफ: 11, सीआरपीएफ: 9, एसएसबी: 7, आईटीबीपी: 6) में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था। 

गृह सचिव से मांगा गया यह स्पष्टीकरण
सीएपीएफ में आईपीएस की लगातार प्रतिनियुक्ति की वजह क्या रही। इसके लिए अपनाई गई प्रक्रिया (जिसमें यह भी शामिल है कि क्या औपचारिक रूप से मांग की गई थी) क्या थी। आईपीएस प्रतिनियुक्ति को एसएजी ग्रेड तक चरणबद्ध तरीके से कम करना (फेज-आउट) के आदेश के बावजूद प्रतिनियुक्ति क्यों जारी रही। केंद्रीय गृह सचिव का तर्क है कि अदालत के आदेश में आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर पूरी तरह रोक लगाने की बजाय उसमें धीरे-धीरे कमी लाने की बात कही गई थी। जब तक कमी लाने की प्रक्रिया की योजना बनाई जा रही है, तब तक कानूनी भर्ती नियमों के दायरे में ही प्रतिनियुक्ति हो रही है। 

संवैधानिक और कानूनी आधार: 
अनुच्छेद 312 आईपीएस अधिकारियों को केंद्र और राज्यों के लिए एक 'ऑल इंडिया सर्विस' (अखिल भारतीय सेवा) के रूप में मान्यता देता है। सूची I की एंट्री 2ए केंद्रीय बलों की तैनाती को संभव बनाती है। सेंट्रल डेपुटेशन रिजर्व:  
आईपीएस (कैडर) नियम, 1954 का नियम 6(1) संघीय समन्वय और आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए वरिष्ठ पदों का 40% हिस्सा आरक्षित करता है। 

सीएपीएफ का नया कानून: 
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) एक्ट 2026, केंद्र सरकार को स्पष्ट रूप से भर्ती के तरीके (जिसमें प्रतिनियुक्ति भी शामिल है) तय करने का अधिकार देता है। 
नोट: इसकी वैधता को रिट याचिका (सी) नंबर 873/2026 में चुनौती दी गई है। 

ऑपरेशनल और सुरक्षा के लिहाज से वजह: 
विद्रोह, आतंकवाद व उग्रवाद से निपटने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य पुलिस एवं केंद्रीय सशस्त्र बलों के बीच तालमेल के लिए आईपीएस और सेना की प्रतिनियुक्ति बहुत जरूरी है। 

प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया: 
मई 2025 के बाद जितने भी आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर आए हैं, उसके लिए सीएपीएफ के महानिदेशकों द्वारा मांग की गई थी। इसमें तय कोटे का आधार, खास कामकाज और ऑपरेशनल जरूरत आदि शामिल रहा। 

कैडर समीक्षा और अनुपालन कार्रवाई: 
केंद्र सरकार ने मई 2025 के आदेश को पूरी तरह लागू करने के लिए समय बढ़ाने की मांग करते हुए एक विविध आवेदन (डायरी नंबर 14121/2026) दायर किया है। अभी एक व्यापक कैडर समीक्षा प्रक्रिया चल रही है, जिसमें सीएपीएफ अधिकारियों के करियर में तरक्की और ऑपरेशनल जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए सभी केंद्रीय बलों की फील्ड यूनिट्स से इनपुट लिए जा रहे हैं। करियर में ठहराव को कम करने के लिए सीएपीएफ अधिकारियों को नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) की सुविधा दी गई है। 

क्या कहते हैं पूर्व अफसर?
इस बाबत पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) एक्ट 2026 ही पूरी तरह गलत है। सरकार इसके जरिए कैडर अफसरों के साथ भेदभाव कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को खत्म करने के लिए सरकार ये 'काला नियम' लाई थी। पिछले डेढ़ दशक में सर्वोच्च अदालत, सरकार के विभिन्न तर्कों को मेरिट के आधार पर खारिज कर चुकी है। उनकी समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी गई। सरकार ने सीएपीएफ के नए एक्ट के जरिए सभी शक्तियां अपने हाथ में ले ली हैं। नोटिफिकेशन के द्वारा सीएपीएफ के लिए रूल बनाना, अफसरों की भर्ती, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति या सेवा की शर्तें, सरकार इन्हें नोटिफिकेशन द्वारा तय कर सकती है। यह निर्णय, किसी भी अदालती फैसले या डिक्री से प्रभावित नहीं होगा। पूर्व कैडर अफसरों ने कहा, यहां पर तो सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति भी काम नहीं करेगी। 

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