जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के सामने केंद्र ने कहा, निडर सुशासन भी किसी सांविधानिक शासन का बुनियादी हिस्सा है। केंद्र के पक्ष रखने के बाद पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भ्रष्टाचार विरोधी कानून का वह प्रावधान, जो भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए पूर्वानुमति को अनिवार्य करता है, विधायिका द्वारा निडर शासन स्थापित करने का एक प्रयास है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने कहा, यह प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि ईमानदार अधिकारियों को दंडित न किया जाए और बेईमान अधिकारी बच न सकें।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के सामने केंद्र ने कहा, निडर सुशासन भी किसी सांविधानिक शासन का बुनियादी हिस्सा है। केंद्र के पक्ष रखने के बाद पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इस धारा के तहत भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए पूर्वानुमति अनिवार्य है।
पीठ ने 2018 में अधिनियम की संशोधित धारा 17ए के लागू होने के बाद से प्राप्त भ्रष्टाचार की शिकायतों की संख्या के बारे में मेहता से जानकारी मांगी। मेहता ने कहा कि वह सीबीआई को प्राप्त शिकायतों के आंकड़े दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि 60 प्रतिशत शिकायतों के मामले में जांच की मंजूरी दी गई। इस पर याचिकाकर्ता एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा, सरकार का यह कहना है कि छह वर्षों में, 2,395 शिकायतें जांच के लिए आईं। इनमें से 989 यानी लगभग 41 प्रतिशत को उन्होंने अस्वीकार कर दिया और 1,406 को मंजूरी दी।
मेहता ने कहा, मंजूरी देते या अस्वीकार करते समय उचित तर्क रखते हुए आदेश पारित किए गए। उन्होंने कहा, ये आदेश न्यायिक जांच का विषय हो सकते हैं और पीड़ित पक्ष इन्हें हमेशा चुनौती दे सकता है। मेहता ने कहा, इस आक्रामक अतिसक्रियता के दौर में, जैसे ही किसी शिकायत को अस्वीकार किया जाता है, शिकायतकर्ता आरटीआई लेकर आ जाता है।