कई प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल के दौरान यह देखा जाता था कि मंत्रिमंडल में उनके कद के बराबर कौन है। अगर ताकतवर प्रधानमंत्री हैं तो उन्हीं का नाम लेकर कहा जाता कि मंत्री तो एक ही है, बाकी तो दरबारी हैं। प्रो. आनंद कुमार कहते हैं, आज केंद्रीय मंत्रिमंडल में मोदी के कद के बराबर कोई नहीं है। जब तक अरुण जेटली या सुषमा स्वराज जैसे नेता रहे तो यह माना जाता था कि वे उस योग्यता के मापदंडों पर खरे उतरते हैं। आज मंत्रिमंडल में योग्यता का अभाव रहा है। यही वजह है कि पीएम मोदी को बड़ा फेरबदल करना पड़ रहा है।
प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि कोरोना काल में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें विभाग का मंत्री कोई दूसरा है और जवाब कोई अन्य मंत्री दे रहा है। रक्षा, कृषि और शिक्षा के मामलों में ऐसा कुछ देखने को मिला है। इससे सरकार की छवि खराब हुई है। विदेशी मामलों में अच्छे की अपेक्षा की थी, मगर यहां भी निराशा ही हाथ लगी। आनंद कुमार कहते हैं, यहां तक कि नेपाल के साथ भी अच्छे संबंध नहीं बन सके। एक दूसरे मंत्रालयों में जबरदस्त हस्तक्षेप रहा है। अब अयोग्य लोगों की छंटाई और योग्य लोगों को मंत्रिमंडल में मौका दिया जा रहा है।
राजनीतिक मामलों के जानकार प्रोफेसर प्रो. आनंद कुमार के अनुसार, मौजूदा सरकार में केंद्रीय मंत्रियों का इस्तीफा दर्शाता है कि वे पद की जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। सरकार की ऐसी छवि बन गई थी कि विपक्ष ने उसे नीतिविहीन और दिशाहीन कहना शुरू कर दिया। देश में किसानों का मुद्दा अनसुलझा रहा। चीन के साथ तनातनी चलती रही। बैंक डूबने की खबरें आती रही। कोरोनाकाल में स्वास्थ्य को लेकर मोदी सरकार को लोगों का विरोध झेलना पड़ा।
कोरोना की पहली व दूसरी लहर के दौरान व्यवस्था अच्छी नहीं रही। नतीजा, हर्षवर्धन से इस्तीफा ले लिया गया। मोदी का मुख्य एजेंडा था नई शिक्षा नीति, लेकिन निशंक उस पर कुछ अच्छा नहीं कर सके। उन्हें भी बाहर जाना पड़ा है। महंगाई पर जो हो रहा है, वह सबके सामने है। पहली बार सरकार लाचार दिख रही है। पीएम को नेहरू मंत्रिमंडल के सरदार पटेल, देसाई और पंत जैसे मंत्रियों की तलाश है। देखने वाली बात ये है कि उनकी तलाश पूरी होती है या नहीं।