भारत में भी शिक्षाविदों का मानना है कि हर पांच साल में बच्चों की किताबों की समीक्षा, उसमें समय के अनुसार बदलाव, नए ज्ञान का समावेश होना चाहिए। हर दस साल में शिक्षा नीति में बदलाव होना चाहिए। नए सिरे से पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पाठ्यक्रम का निधारण होना चाहिए। खुद जेएस राजपूत मानते हैं कि दुनिया के देशों में दो-तीन साल के भीतर वहां की शिक्षा, शिक्षा के पैटर्न, पाठ्यपुस्तकों में बदलाव हो जाता है।
नए ज्ञान का समावेश और नए पैटर्न को अपनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। 2000 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अब्दुल वाहिद खां थे। खां ने एक साक्षात्कार में कहा था कि हर तीन-चार साल में नॉलेज का विस्फोट होगा। नई तकनीक आएगी, नए ज्ञान की जरूरत पड़ेगी। चाहे गाड़ी हो या फोन सबकुछ तीन चार साल में काफी कुछ बदल जाएंगे। इसलिए हमें शिक्षा के सुधार में बड़े और तेज प्रयास की आवश्यकता है।
चार साल लग गए शिक्षा नीति बनने में
वर्तमान शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार कराने का जिम्मा स्मृति ईरानी ने उठाया था। पूर्व कैबिनेट सचिव सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में कमेटी का गठन भी हो गया। इसमें जेएस राजपूत सरीखे अन्य भी रहे। समिति ने रिपोर्ट दी, लेकिन केंद्र सरकार ने व्यापक सुझाव लेने का मन बनाया। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बने। जावड़ेकर ने इसे पूर्व इसरो वैज्ञानिक, राज्यसभा सांसद डॉ. कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में समित बनाकर उसे सौंप दिया। इस समिति की सिफारिशें भी काफी पहले से मंत्रालय के पास पड़ी रही। अब जाकर मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कैबिनेट में मसौदे को पेश करके मंजूरी दिलाई।
क्या हुआ है भारत में?
डॉ. मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे। शिक्षाविद जोशी ने अपनी देखरेख में नए पाठ्यक्रम की एक रुपरेखा, नया पाठ्यक्रम, नई किताबों का लेखन कराया। 2003 तक देश के छात्र नई पाठ्यपुस्तक पढ़ने के लिए पा सके। शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगा। 2004 में केंद्र सरकार बदल गई। मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने शिक्षा विद प्रो. यशपाल के मार्ग दर्शन में नई पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, किताब लेखन का काम शुरू कराया। अर्जुन सिंह का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के भगवाकरण का था।
इसलिए उन्होंने अपने लेखकों द्वारा निर्धारित भगवाकरण के अंश किताबों से हटवाए, 1999 तक चल रही पुरानी किताबों के बड़े अंश को शामिल किया और नई किताबें छात्रों को मिल गई। कहा जा सकता है कि शिक्षा में सुधार का अधूरा काम काम हुआ। जेएस राजपूत भी कहते हैं कि यहां तो मकसद शिक्षा में राजनीतिकरण को घटाना-बढ़ाना था। इसलिए कुछ खास नहीं हो सका। वहीं किताबें अभी भी छात्र पढ़ रहे हैं। सभी बदलाव में शिक्षा में बस्ते का बोझ कम करना अहम रहा, लेकिन नए ज्ञान की बात बहुत कम आ सकी। कह सकते हैं कि शिक्षा में पिछले दो दशक में कोई बड़ा सुधार नहीं हो सका।
शिक्षा में आसमान के तारे जाने कब जमीन पर उतरेंगे?
जेएस राजपूत भी मानते हैं कि उचित अनुपात में कक्षा में छात्र और नियमित शिक्षकों की मौजूदगी सरकार की जिम्मेदारी है। साल 2000 से केंद्र सरकार देश की कक्षाओं में 40 छात्रों के पीछे एक नियमित शिक्षक का पैमाना मानकर चल रही है। 2005 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने भी इस पर जोर दिया था। इसके बाद कपिल सिब्बल, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर और अब रमेश पोखरियाल निशंक हैं।
दो दशक बाद भी केंद्रीय विद्यालयों में छात्र और शिक्षक का एक शिक्षक के अनुपात में 50 से अधिक छात्र हैं। राज्यों के प्राथमिक विद्यालयों, माध्यमिक स्तर के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में यह अनुपात और मुंह चिढ़ाता है। नियमित शिक्षकों के पद खाली हैं। खुद जेएस राजपूत का कहना है कि आठ लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी स्वीकृतों पदों पर भारी रिक्तियां हैं।
अब यह नहीं चलेगा
नई शिक्षा नीति के अमल में आने के बाद सभी विश्वविद्यालय शिक्षा की सामग्री, उसके मानक के लिए एक सूत्र में बंध जाएंगे। यह अच्छा प्रयास है। जबकि पहले नागालैंड में एक ऐसा भी विश्वविद्यालय चर्चा में आ चुका है जो तीन साल के भीतर 500 लोगों को पीएचडी की डिग्री दे चुका है। राजस्थान की झुनझुनू में स्थित सिंघानिया यूनिवर्सिटी समेत तमाम पर डिग्री बिकने जैसे गंभीर सवाल उठ चुके हैं।
लेकिन अब यह दौर लदेंगे, क्योंकि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय नियामक अथॉरिटी बनने का रास्ता साफ हो रहा है। भारतीय उच्चतर शिक्षा परिषद (एचईसीआई) दमदार भूमिका में आएगा। राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी) के गठन से कई विसंतियां दूर होने की संभावना है। इस तरह से कई और संस्थाएं पुरानी संस्थाओं का परिष्कृत रूप होंगी।
फिर भी शिक्षा नीति ने एक सपना दिखाया है