संजय अभिज्ञान - भारत गावों में बसता है। आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा खेती कर रहा है। राजनीति का यह कैसा विचलन है जिसमें राजनेताओं को किसानों की अवहेलना करने की आजादी मिल जाती है।
विनोद अग्निहोत्री - अर्थव्यवस्था में सभी वर्ग आपस में जुड़े हुए हैं। किसान सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। किसान की आय कम होगी तो इसका असर सब पर पड़ेगा। किसान की अवहेलना किसान नेताओं की वजह से होती है। एक समय में किसान नेताओं की तूती बोलती थी। चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल, बलराम जाखड़ जैसे किसान नेता हुआ करते थे। आज राजनीतिक पार्टियों में किसान नेता नहीं हैं। जो किसान नेता हैं वो कारपोरेट की गोद में बैठ गए हैं। और जो डॉ सुनीलम जैसे किसान नेता जो सड़क पर हैं आंदोलन कर रहे हैं उनका राजनीति में दखल नहीं है।
डॉ सुनीलम - छोटू राम, सहजानंद सरस्वती, नारायण स्वामी, शरद जोशी ऐसे बहुत से किसान नेताओं का नाम जोड़ना चाहता हूं। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि सरकारों की विकास की एक दृष्टि हैं कि जब तक आम किसानी और गांव खत्म नहीं होगा तब तक यह देश तरक्की नहीं कर सकता। यह मुख्यधारा की सोच है। अगर इस मुख्यधारा की सोच के साथ सरकार बनती हैं और राजनीतिक पार्टियां काम करती हैं। तो फिर किसान संगठनों की भूमिका हो जाती है कि हम अपनी ताकत कितनी इकट्ठा कर अपना हिस्सा लेने का प्रयास करते हैं। किसानों की स्थिति के लिए सरकारें जिम्मेदार हैं। किसान की तरक्की के बिना देश नहीं बनेगा।
ऐसा पहली बार हुआ है कि 30 राज्यों के 190 किसान संगठन एक साथ आए हैं। किसानों को समझ आ गया है कि अकेले लड़कर वे अपनी किसानी नहीं बचा सकते और हक नहीं पा सकते। हम एकजुटता बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
संजय अभिज्ञान - किसानों के नजरिये से बजट को 10 में से कितने नंबर देंगे?
डॉ सुनीलम - जीरो।
विनोद अग्निहोत्री - मैं कम से कम 5 नंबर दूंगा। लेकिन मैं कहूंगा कि वोट देते समय किसान हिंदू मुसलमान हो जाता है।
डॉ सुनीलम - किसान की पहचान पीछे चली जाती है और उसकी राजनीतिक, जातीय या धार्मिक पहचान सामने आ जाती है। यह एक बहुत बड़ी चुनौती है।
संजय अभिज्ञान - चर्चा का निष्कर्ष है कि बजट में किसान के लिए दोनों तरह की खबरें हैं। कुछ अच्छी चीजें भी हैं। लेकिन धरातल पर देखें तो बहुत उम्मीदें नहीं जगतीं। यह विडंबना है राजनीति की कि चुनाव के समय किसान की पहचान किसान की नहीं रहती।