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बहुत कुछ कहते हैं राजस्थान और पश्चिम बंगाल उपचुनावों के नतीजे

Thu, 01 Feb 2018 08:44 PM IST
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला नई दिल्ली
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कांग्रेस
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जिस समय लोकसभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट भाषण पर भाजपा के सांसद मेजें थपथपा रहे थे, ठीक उसी समय राजस्थान में तीन उपचुनावों अजमेर, अलवर लोकसभा सीट, मांडलगढ़ विधानसभा और पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों की मतगणना हो रही थी, जिसमें भाजपा लगातार कांग्रेस से पीछे होती जा रही थी। दोपहर तक जब वित्त मंत्री अपना बजट भाषण पूरा कर चुके थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित सरकार के मंत्री और सांसद बजट को लेकर सरकार की पीठ थपथपा रहे थे, तब तीनों सीटों पर कांग्रेस इतना आगे निकल चुकी थी कि उसकी जीत में कोई संदेह नहीं रह गया था। इसी तरह प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने दोनों सीटों पर जीत दर्ज कर ली।
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हालांकि बजट की प्रशंसा और आलोचना के शोर में इन उपचुनावों के नतीजों का जिक्र और उनका विश्लेषण गायब हो गया, लेकिन इन उपचुनावों के नतीजों का संदेश केंद्र की भाजपा सरकार और राजस्थान की प्रदेश भाजपा सरकार की नींद उड़ाने वाला है। वहीं प. बंगाल के उपचुनाव नतीजे कहते हैं कि चाहे भले ही भाजपा कितनी भी ताकत लगा ले और ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाकर हिंदू ध्रुवीकरण की कोशिश करे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का जनाधार और मजबूती अभी बरकरार है। 

नवंबर-दिसंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हैं

कांग्रेस
इस साल के आखिर में नवंबर-दिसंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हैं और उसके सिर्फ पांच से छह महीने बाद अप्रैल-मई में लोकसभा के चुनाव होंगे। इसलिए राजस्थान में अजमेर, अलवर और मांडलगढ़ के नतीजे कांग्रेस का हौसला बढ़ा रहे हैं, वहीं भाजपा को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि 2013 में राजस्थान की जिस जनता ने विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत दिया और 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी की आंधी चली, उसी राजस्थान के इन उपचुनावों में जिनमें राज्य की दोनों लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट को मिलाकर कुल 17 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा एक भी सीट में कांग्रेस को पछाड़ नहीं पाई। 

जबकि 2013 में मांडलगढ़ से राजपरिवार की सिद्धी कुमारी भाजपा से चुनाव जीती थीं, 2014 में अजमेर से सांवरलाल जाट और अलवर से महंत चांदनाथ भाजपा सांसद चुने गए थे। इन तीनों के निधन के बाद यह उपचुनाव हुए। इन उपचुनाव के नतीजों ने जहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की चुनौतियां बढ़ा दीं हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी राजस्थान को लेकर फिक्रमंद कर दिया है। 
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2018 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की चुनौती बढ़ जाएगी

प्रतीकात्मक तस्वीर
क्योंकि 25 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में ये नतीजे अगर कांग्रेस की बढ़त का संकेत हैं तो न सिर्फ 2018 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की चुनौती बढ़ जाएगी, बल्कि अप्रैल-मई 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के लिए अपनी मौजूदा सांसद संख्या बनाए रखने का यक्ष प्रश्न भी खड़ा हो गया है। प्रदेश भाजपा में हालांकि वसुंधरा राजे को चुनौती देने की हैसियत अभी भी किसी नेता की नहीं है लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के बेहद करीबी माने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर और उनके समर्थक अब अपना दबाव बढ़ाएंगे।

इन नतीजों ने जहां राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है, वहीं अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच नेतृत्व संघर्ष भी तेज होगा। जहां दोनों ही इस जीत का श्रेय लेने की पूरी कोशिश करते हुए मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए अपना-अपना दावा ठोकेंगे, वहीं विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे में भी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी की जोर आजमाइश भी बढ़ेगी। 

इसलिए हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष बने राहुल गांधी के लिए भी अब एक बड़ी परीक्षा यह होगी कि किस तरह वह इन दोनों नेताओं और राज्य के अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच समन्वय और संतुलन बनाकर विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करें। लेकिन ये नतीजे कर्नाटक की लड़ाई की तैयारी में जुटी कांग्रेस और अध्यक्ष राहुल गांधी का हौसला तो बढ़ाएंगे ही, दक्षिण के इस राज्य के कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी अपनी जीत की संभावना दिखाने में मदद करेंगे।
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