समान नागरिक संहिता क्या है?
समान नागरिक संहिता का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी धर्मों का एक कानून होगा। शादी, तलाक, गोद लेने और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा।
यह मुद्दा कई दशकों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। UCC केंद्र की मौजूदा सत्ताधारी भाजपा के लिए जनसंघ के जमाने से प्राथमिकता वाला एजेंडा रहा है। भाजपा सत्ता में आने पर UCC को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का भी हिस्सा था। इसके साथ ही उसके शासन वाले राज्यों में इसे जोर-शोर से लागू भी कराया जा रहा है। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल में यूसीसी लागू कराना पार्टी का अगला लक्ष्य है।
समान नागरिक संहिता क्या करेगी?
UCC लागू होने पर हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून, विशेष विवाह अधिनियम जैसे कानूनों की जगह लेगा। समान नागरिक कानून तब सभी नागरिकों पर लागू होगा चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। इसके समर्थकों का तर्क है कि यह लैंगिक समानता की बढ़ावा देने, धर्म के आधार पर भेदभाव की कम करने और कानूनी प्रणाली की सरल बनाने में मदद करेगा। वहीं, दूसरी ओर विरोधियों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगा और व्यक्तिगत कानूनों को प्रत्येक धार्मिक समुदाय के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।
कानून के विरोध में कौन था?
मद्रास से आने वाले सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने अनुच्छेद 35 में एक संशोधन का प्रस्ताव रखा। इसमें कहा गया कि किसी भी समूह, वर्ग या लोगों के समुदाय को अपने व्यक्तिगत कानून को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, यदि उसके पास कोई व्यक्तिगत कानून है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी के व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना एक मौलिक अधिकार है और ये कानून लोगों की जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हैं।
इस्माइल का मानना था कि व्यक्तिगत कानूनों में कोई भी हस्तक्षेप उन लोगों की जीवनशैली में हस्तक्षेप करने के जैसे होगा जो पीढ़ियों से इन कानूनों का पालन करते आ रहे हैं। उन्होंने तर्क रखा कि चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है, इसलिए उसे ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो उसके लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक लोकाचार को बाधित कर सकते हैं। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने यूगोस्लाविया, सर्बिया, क्रोएशिया और स्लोवेनिया के उदाहरणों का हवाला दिया। इसके अलावा उन्होंने अल्पसंख्यकों से जुड़े अन्य यूरोपीय संविधानों का भी उल्लेख किया।
संविधान सभा के सदस्य एमए अयंगर ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया। अयंगर ने तर्क दिया कि धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा सभी धर्मों को समान सम्मान और गरिमा के साथ समायोजित करती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में विभिन्न समुदायों को अपने धर्म और संस्कृति का पालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अयंगर के अनुसार, लोगों को अपने व्यक्तिगत कानून का पालन करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
संविधान सभा के महबूब अली बेग ने बहस में हिस्सा लिया। बेग का तर्क था कि अनुच्छेद 35 में उल्लिखित नागरिक संहिता में पारिवारिक कानून और विरासत शामिल नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि यह स्पष्ट करने के लिए एक प्रावधान जोड़ा जाए कि नागरिक संहिता संपत्ति हस्तांतरण और अनुबंध जैसे मामलों को विनियमित करेगी न कि व्यक्तिगत कानूनों को।
इसके अलावा कई अन्य सदस्यों ने धार्मिक कानूनों में हस्तक्षेप करने के संविधान सभा के अधिकार पर सवाल उठाया। उनका मानना था कि अनुच्छेद 35 धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है।