वैश्वीकरण की हवाओं से प्रेरित लोग वैश्विक संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं जो स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों और पहचान के लिए एक खतरे के रूप में उभर रही है। यहां तक कि सोशल मीडिया, टेलीविजन और पॉप संस्कृति जीवन के एक विशेष तरीके को ग्लैमराइज कर रही है और दुख की बात है कि लोग आंखें बंद करके इसकी तरफ बढ़ रहे हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण ने शुक्रवार को एक कार्यक्रम में यह बात कही। उस्मानिया विश्वविद्यालय के 82वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए सीजेआई रमण ने यह भी कहा कि सभी संस्थानों के लिए संविधान और शासन के बारे में बुनियादी विचारों पर एक विषय पेश करने का समय आ गया है, चाहे सीखने की धारा कुछ भी हो। सभी की समझ और सशक्तिकरण के लिए संविधान के विचारों को सरल बनाने की जरूरत है।
उन्होंने आगे कहा, हालांकि हमने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन हमारा समाज धन और संसाधनों तक पहुंच को लेकर विभाजित होते जा रहा है। 2021 की यूनेस्को विश्व रिपोर्ट का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति रमण ने कहा कि आज दुनिया में बोली जाने वाली लगभग 7,000 भाषाओं में से आधी सदी के अंत तक गायब हो सकती हैं और प्रत्येक भाषा के नुकसान के साथ लोग न केवल काफी साहित्य और लोकगीत खो रहे हैं, बल्कि पीढ़ियों से विरासत में मिला ज्ञान भी खो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि चूंकि बाजार वैश्विक अर्थव्यवस्था की मांगों से प्रेरित है, अधिक से अधिक किसान अल्पकालिक लाभ के लिए स्वदेशी फसलों से आगे बढ़ रहे हैं और फसल पैटर्न में यह बदलाव मिट्टी के चरित्र को बदल रहा है, जिससे जैव विविधता को बढ़ावा देने की क्षमता कम हो रही है। इसी तरह, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण भी जंगली किस्मों को प्रभावित कर रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप एक बड़ा पारिस्थितिक असंतुलन हो रहा है।