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समुद्र के नीचे छिड़ेगी नई जंग?: 15 लाख किमी केबल-पाइपलाइन खतरे में, अब ड्रोन करेंगे गहराई की निगरानी

Sun, 20 Sep 2026 06:08 AM IST
राकेश कुमार अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन/नई दिल्ली।

सार

समुद्र तल पर बिछा 15 लाख किलोमीटर से अधिक का संचार नेटवर्क, पाइपलाइन और बिजली केबल अब सुरक्षा की नई चुनौती बन रहे हैं। संभावित तोड़फोड़ और जासूसी से बचाने के लिए स्वायत्त अंडरवाटर ड्रोन, सेंसर और एआई आधारित निगरानी तकनीक विकसित की जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में समुद्र के नीचे मानव संचालित और स्वायत्त प्रणालियां साथ काम कर सकती हैं, लेकिन पूरे नेटवर्क की सुरक्षा अभी बड़ी चुनौती है।
 
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समंदर में युद्ध का खतरा! - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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दुनिया में युद्ध का मैदान अब सिर्फ जमीन, आसमान और समुद्र की सतह तक सीमित नहीं रह गया है। समुद्र की गहराई में भी एक नई रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आकार ले रही है। वजह है समुद्र तल पर फैला वह विशाल बुनियादी ढांचा, जिस पर वैश्विक इंटरनेट, ऊर्जा और संचार व्यवस्था काफी हद तक निर्भर है। इन केबलों और पाइपलाइनों को संभावित तोड़फोड़, जासूसी और सैन्य गतिविधियों से बचाने के लिए सरकारें और रक्षा कंपनियां नई पीढ़ी के स्वायत्त ड्रोन, सेंसर और निगरानी प्रणालियां विकसित कर रही हैं।
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दुनिया के अलग-अलग देशों को जोड़ने वाली बड़ी संख्या में इंटरनेट और संचार केबल समुद्र के तल में बिछी हैं। दूरसंचार शोध संस्था टेली जियोग्राफी के अनुसार 2026 की शुरुआत तक दुनिया में 15 लाख किलोमीटर से अधिक सबमरीन कम्युनिकेशन केबल सेवा में थीं।इनके अलावा समुद्र के नीचे तेल और गैस पाइपलाइन तथा बिजली की केबल भी मौजूद हैं। समुद्र में लगाए गए पवन ऊर्जा संयंत्रों से जमीन तक बिजली पहुंचाने के लिए भी अंडरसी केबल का इस्तेमाल बढ़ रहा है।यानी समुद्र तल पर मौजूद यह नेटवर्क सिर्फ रक्षा से जुड़ा विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध इंटरनेट कनेक्टिविटी, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था से है।

नॉर्ड स्ट्रीम विस्फोट ने बढ़ाई चिंता
सीएनबीसी के अनुसार सितंबर 2022 में रूस के यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने के हमले के कुछ महीनों बाद बाल्टिक सागर में नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइनों में विस्फोट हुए थे। इन पाइपलाइनों के जरिए रूस से जर्मनी तक प्राकृतिक गैस पहुंचाई जाती थी।इस घटना के बाद समुद्र के नीचे मौजूद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर यूरोपीय देशों सहित कई सरकारों की चिंता बढ़ी। चाथम हाउस की वरिष्ठ शोधकर्ता कात्या बेगो का कहना है कि शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक इस क्षेत्र पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया और अब सरकारों को इस क्षेत्र में तेजी से तैयारी करनी पड़ रही है।समुद्र के नीचे बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि किसी देश की महत्वपूर्ण संचार और ऊर्जा व्यवस्था को युद्ध की स्थिति में कैसे सुरक्षित रखा जाए।
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ड्रोन बनेंगे समुद्र के नीचे के प्रहरी
समुद्र तल की निगरानी के लिए अब स्वायत्त अंडरवाटर व्हीकल यानी ऐसे पानी के भीतर चलने वाले ड्रोन विकसित किए जा रहे हैं, जिन्हें हर समय इंसान द्वारा नियंत्रित करने की जरूरत नहीं होती।जर्मनी की रक्षा तकनीक कंपनी यूरोएटलस का ग्रेशार्क ऐसा ही एक स्वायत्त अंडरवाटर वाहन है। कंपनी के अनुसार यह किसी निर्धारित क्षेत्र में जाकर खुद रास्ता तय कर सकता है और वहां निगरानी या निरीक्षण का काम कर सकता है।मसलन, यदि यह किसी पाइपलाइन की जांच के दौरान ऐसी वस्तु देखता है जो समुद्री बारूदी सुरंग जैसी दिखाई देती है, तो यह उसकी जानकारी ऑपरेटर तक पहुंचा सकता है। इसके बाद मानव ऑपरेटर तय कर सकता है कि आगे जांच करनी है या नहीं।इस तरह के ड्रोन का उद्देश्य हर किलोमीटर केबल की सुरक्षा के लिए युद्धपोत तैनात करना नहीं है। इसके बजाय ऐसे वाहनों का नेटवर्क रणनीतिक क्षेत्रों में लगातार निगरानी कर सकता है।

हर जगह युद्धपोत भेजना संभव नहीं
समुद्र तल की निगरानी की सबसे बड़ी समस्या उसका विशाल आकार है। दुनिया भर में लाखों किलोमीटर केबल और पाइपलाइन फैली हैं। इतनी बड़ी दूरी की लगातार निगरानी के लिए बड़ी संख्या में युद्धपोत, पनडुब्बियां और समुद्री गश्ती विमान तैनात करना बेहद महंगा और व्यावहारिक रूप से कठिन है।यही कारण है कि स्वायत्त प्रणालियों को महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लगातार निगरानी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।चाथम हाउस की कात्या बेगो ने सीएनबीसी से कहा कि पूरे समुद्री नेटवर्क के हर हिस्से की सुरक्षा करना संभव नहीं है। इसलिए निगरानी को उन क्षेत्रों पर केंद्रित करना होगा, जहां रणनीतिक महत्व ज्यादा है। 

अब ड्रोन बनाम ड्रोन की तैयारी
समुद्र के नीचे की प्रतिस्पर्धा सिर्फ निगरानी तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। जिस तरह एक देश स्वायत्त अंडरवाटर वाहन विकसित कर रहा है, उसी तरह दूसरे देश भी ऐसे सिस्टम बना रहे हैं। यूरोएटलस की रणनीति और साझेदारी अधिकारी वेरीनिया कोड्रियन के अनुसार भविष्य में ऐसे मिशन विकसित हो सकते हैं जिनका उद्देश्य दूसरे देशों के स्वायत्त अंडरवाटर वाहनों की पहचान, निगरानी और ट्रैकिंग करना हो।इसका मतलब है कि समुद्र के नीचे मशीन बनाम मशीन गतिविधि बढ़ सकती है।हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि स्वायत्त ड्रोन पारंपरिक पनडुब्बियों और युद्धपोतों की जगह ले लेंगे। भविष्य में मानव संचालित और स्वायत्त प्रणालियों के एक साथ काम करने की संभावना अधिक है।

एआई और सेंसर बदल रहे हैं निगरानी का तरीका
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर तकनीक और स्वायत्त प्रणालियों में तेजी से हो रही प्रगति ने समुद्र के नीचे निगरानी की नई संभावनाएं पैदा की हैं।केबलों पर सेंसर लगाए जा सकते हैं, जबकि स्वायत्त वाहन समुद्र के अलग-अलग हिस्सों में जाकर असामान्य गतिविधियों की पहचान कर सकते हैं।इस व्यवस्था में किसी संदिग्ध गतिविधि का पता चलने पर मानव ऑपरेटर को सूचना भेजी जा सकती है। इससे पूरी निगरानी व्यवस्था को लगातार मानव नियंत्रण में रखने की जरूरत कम हो सकती है।

लेकिन समुद्र के नीचे ड्रोन चलाना आसान नहीं
हवाई ड्रोन की तुलना में अंडरवाटर ड्रोन के सामने कहीं ज्यादा तकनीकी चुनौतियां हैं। समुद्र के भीतर दृश्यता सीमित होती है और संचार व्यवस्था भी कठिन होती है। रेडियो सिग्नल पानी के अंदर उसी तरह काम नहीं करते जैसे हवा में करते हैं।यही कारण है कि विशेषज्ञ समुद्र के नीचे स्वायत्त तकनीक को अभी ऐसी व्यवस्था नहीं मानते जो पूरे समुद्री बुनियादी ढांचे को सुरक्षित कर सके। यूरोएटलस ग्रेशार्क का हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संस्करण विकसित कर रही है, जिसके लिए कंपनी ने 16 सप्ताह तक पानी के अंदर रहने या 8,000 समुद्री मील तक की क्षमता का लक्ष्य बताया है। हालांकि कंपनी ने अभी तक पानी के भीतर इतनी लंबी अवधि की क्षमता का प्रदर्शन नहीं किया है।

रक्षा कंपनियां देख रही हैं नया बाजार
समुद्र के नीचे बढ़ती सुरक्षा चिंताओं ने रक्षा कंपनियों के लिए एक नया बाजार भी पैदा किया है।इटली की जहाज निर्माण कंपनी फिनकैंटिएरी ने जुलाई में चार कंपनियों में बहुमत हिस्सेदारी खरीदने की करीब 600 मिलियन यूरो की योजना घोषित की थी। इसका उद्देश्य अंडरवाटर और सतह पर चलने वाले ड्रोन, समुद्री सर्वेक्षण तथा समुद्र के नीचे संचार क्षमताओं का विस्तार करना है।फ्रांस की थेल्स जैसी बड़ी रक्षा कंपनियां भी सोनार, पनडुब्बी रोधी युद्ध, समुद्री सुरंगों की पहचान और स्वायत्त अंडरवाटर प्रणालियों से जुड़े कारोबार में सक्रिय हैं।

असली चुनौती: लाखों किलोमीटर नेटवर्क की सुरक्षा
समुद्र के नीचे नई तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, लेकिन मूल समस्या बनी हुई है।इतने विशाल नेटवर्क की सुरक्षा कौन और कैसे करेगा? समुद्र के नीचे मौजूद बड़ी संख्या में केबल और पाइपलाइन निजी कंपनियों के स्वामित्व या संचालन में हैं। सामान्य परिस्थितियों में उनकी देखरेख और मरम्मत कंपनियां करती हैं। लेकिन अगर किसी नेटवर्क को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो या युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो जाए तो मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ जाता है।इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारों की होगी या निजी कंपनियों की? और अगर सुरक्षा के लिए केबलों को और गहराई में दबाना, सेंसर लगाना या लगातार निगरानी करना पड़े तो इसका खर्च कौन उठाएगा?

भविष्य का समुद्री युद्ध कैसा होगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में समुद्र के नीचे की सुरक्षा व्यवस्था में युद्धपोत, पनडुब्बियां, मानव रहित वाहन, सेंसर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सिस्टम एक साथ काम कर सकते हैं। लेकिन फिलहाल इसे समुद्र तल की सुरक्षा का पूर्ण समाधान मानना जल्दबाजी होगी। तकनीक में प्रगति के बावजूद संचार, ऊर्जा, निगरानी और लंबे समय तक पानी के अंदर संचालन जैसी चुनौतियां बड़ी हैं।चाथम हाउस की कात्या बेगो के अनुसार स्वायत्त अंडरवाटर तकनीक मददगार है और इसका इस्तेमाल प्रतिरोध तथा संकेत देने के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह ऐसा समाधान नहीं है जो समुद्र तल को पूरी तरह सुरक्षित बना दे। यानी आने वाले समय में युद्ध की एक नई सीमा समुद्र की सतह के नीचे होगी जहां दिखाई कम देता है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा निर्भर करता है।
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