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चिंताजनक: 2050 तक HIV के साथ जीने को मजबूर होंगे 4.6 करोड़ लोग, महिलाओं में लड़कों के मुकाबले संक्रमण दर ज्यादा

Mon, 02 Dec 2024 06:28 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

‘टेक द राइट्स पाथ टू एन्ड एड्स’ नामक इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया 2030 तक एड्स की रोकथाम के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही है। यह बीमारी अभी भी असमानताओं के कारण फैल रही है और कमजोर वर्ग के लिए जानलेवा साबित हो रही है। 
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : freepik.com
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विस्तार
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एचआईवी के खिलाफ किए जा रहे प्रयासों में तेजी नहीं लाई गई तो 2050 तक दुनियाभर में 4.6 करोड़ लोग इस घातक बीमारी के साथ जीने को मजबूर होंगें। इतना ही नहीं एड्स से मरने वालों का आंकड़ा भी 1.77 करोड़ बढ़ सकता है। यह चेतावनी यूनाइटेड नेशंस प्रोग्राम ऑन एचआईवी (यूएनएड्स) ने अपनी नई रिपोर्ट में दी है। इस समय दुनिया में करीब चार करोड़ लोग एड्स से संक्रमित हैं।

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‘टेक द राइट्स पाथ टू एन्ड एड्स’ नामक इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया 2030 तक एड्स की रोकथाम के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही है। यह बीमारी अभी भी असमानताओं के कारण फैल रही है और कमजोर वर्ग के लिए जानलेवा साबित हो रही है। यह असमानताएं एचआईवी का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए आवश्यक सामाजिक एकजुटता को कमजोर कर रही हैं। इसकी वजह से एड्स के खिलाफ लड़ाई न सिर्फ कठिन हो रही है बल्कि पीड़ितों की सेवाओं तक पहुंच को भी सीमित कर रही है। महिलाओं और बच्चियों के प्रति भेदभाव के साथ दंडित करने वाले कानूनों में कमी की वजह से एचआईवी को रोकने के लिए जारी प्रयासों में बाधाएं आ रही हैं। इस तरह की असमानताएं अक्सर मानव अधिकारों के उल्लंघन से उत्पन्न होती हैं। इनमें से कई तो कानून में भी स्वीकृत हैं। लैंगिक भेदभाव के साथ-साथ एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों समेत कमजोर समुदाय के अधिकारों के हनन के कारण एड्स को रोकना कठिन हो गया है।

युवा महिलाओं में लड़कों के मुकाबले संक्रमण की दर तीन गुना
पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के कम से कम 22 देशों में किशोर बच्चियों और युवा महिलाओं में लड़कों और युवा पुरुषों की तुलना में एचआईवी संक्रमण की दर तीन गुना अधिक है। इसका प्रमुख जैविक कारण है कि युवा महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा अपरिपक्व होती है जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। अन्य यौन संचारित रोगों या संक्रमणों की मौजूदगी से भी एचआईवी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा पुरुषों से भी महिलाओं में एचआईवी संक्रमण आसानी से हो सकता है। साथी द्वारा बरती जा रही यौन हिंसा के कारण भी महिलाओं में एचआईवी का खतरा बढ़ जाता है। असुरक्षित यौन संबंध एचआईवी फैलाने का सबसे बड़ा कारण है।
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एचआईवी पीड़ित महिलाओं का इलाज के बजाय जबरन नसबंदी
एचआईवी से पीड़ित कमजोर वर्ग की महिलाओं का इलाज करने की बजाय जबरन नसबंदी कर दी जाती है। यह महिलाओं के स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है। इन्हें अक्सर ज्यादा पारिवारिक हिंसा का सामना करना पड़ता है और बच्चे पैदा नहीं करने की सलाह दी जाती है। एचआईवी से पीड़ित महिलाओं को रसोई से बाहर रखा जाता है और उनसे बात तक करनी बंद कर दी जाती है। इन्हें घर और परिवार के लिए अछूत और कलंकित माना जाता है। छुआछूत की वजह से इन्हें उपचार केंद्रों से भी दूर रखा जाता है। ऐसा ही व्यवहार बच्चियों और युवतियों के साथ भी किया जाता है। अगर ऐसी महिलाएं सरकारी सेवा में हैं तो उन्हें भारी जलालत का सामना करना पड़ता है।

एचआईवी से पीड़ित महिलाओं को बच्चे की देखभाल या मुलाकात से वंचित कर दिया जाता है। इस तरह की महिलाओं को अपराधी होने का भय मन में बैठ जाता है जिससे उन्हें जरूरी उपचार और रोकथाम सेवाओं तक पहुंचने में दिक्कत होती है। इनके प्रति चिकित्सा क्षेत्र में भी भेदभाव होता है। ये कलंक और भेदभाव के उदाहरण हैं जो एचआईवी से पीड़ित महिलाओं के लिए बहुत आम हैं। एचआईवी महामारी के दौरान कलंक और भेदभाव का महिलाओं और लड़कियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके विनाशकारी प्रभावों के बावजूद एचआईवी प्रोग्रामिंग में कलंक और भेदभाव अक्सर प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे होते हैं।
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