हाल ही में गुजरात के सौराष्ट्र जिले के उना में हुए दलितों की पिटाई जैसे ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई वैसे ही कई राजनीतिक पार्टियों और दलित संस्थाओं ने पीड़ित दलितों को लाखों रुपये बतौर मुआवजा थमा दिया लेकिन आलम यह है कि उनके पास कोई बैंक अकाउंट ही नहीं है जिसमें वह पैसे जमा करा सकें।
मरे जानवरों की चमड़ी छिलकर अपना जीवनयापन करने वाले जिन सात दलितों की पिटाई की गई थी उनमें से दो के पास कोई बैंक खाता ही नहीं है। उनमें से एक बेचर सरवैया (30) ने बताया कि वह जानवरों की खाल बेचकर रोजाना 50 रुपये की कमाई करते थे लेकिन उनका अबतक कोई खाता नहीं खुल पाया है। वह पिछले छह महीने से इस कोशिश में लगे थे कि उनका खाता खुल जाए लेकिन अबतक ऐसा हो नहीं पाया।