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UN Report: बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा पड़ रही जलवायु आपातकाल की मार, 30 साल में लू से 85% बढ़ी मौतें

Wed, 16 Jul 2025 05:49 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

 संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक तापमान का असर सबसे ज्यादा बुजुर्ग आबादी पर पड़ रहा है। पिछले तीन दशकों में हीटवेव (लू) से बुजुर्गों की मौतों में 85 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है और अगर वैश्विक तापमान  2 डिग्री सेल्सियस और बढ़ा तो इन मौतों में 2050 तक 370 फीसदी तक उछल आ सकता है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik
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विस्तार
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बढ़ती वैश्विक गर्मी अब केवल मौसम का मामला नहीं बल्कि मानवाधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक तापमान का असर सबसे ज्यादा बुजुर्ग आबादी पर पड़ रहा है। पिछले तीन दशकों में हीटवेव (लू) से बुजुर्गों की मौतों में 85 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है और अगर वैश्विक तापमान  2 डिग्री सेल्सियस और बढ़ा तो इन मौतों में 2050 तक 370 फीसदी तक उछल आ सकता है।

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संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ताजा फ्रंटियर रिपोर्ट ‘द वेट ऑफ टाइम’ बताती है कि पूरी दुनिया में 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोग हीटवेव के कारण सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। खासकर घनी आबादी वाले शहरों और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में इसका असर  ज्यादा है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता घटती जाती है जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, अस्थमा और निमोनिया जैसी बीमारियों से मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भारत सहित कई एशियाई देशों में यह असर साफ दिखता है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1986-2005 और वर्ष 2013-2022 के बीच भारत में 65 से ज्यादा आयु वर्ग को हर वर्ष औसतन 2.1 से 4 अतिरिक्त हीटवेव वाले दिन झेलने पड़े हैं। द वेट ऑफ टाइम रिपोर्ट, यूएनईपी की फ्रंटियर्स सीरीज का सातवां संस्करण है जिसे फोरसाइट ट्रैजेक्टरी इनिशिएटिव के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है। इसका उद्देश्य वैश्विक पर्यावरणीय संकटों के उभरते पहलुओं को उजागर करना है।

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रिपोर्ट में हवा के तापमान और सापेक्षिक आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) को मिलाकर हीट स्ट्रेस का आकलन किया गया है। निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं।भूमध्यरेखीय (ट्रॉपिकल)क्षेत्रों में खतरनाक गर्मी का संपर्क दोगुना हो सकता है।मध्य अक्षांश (मिड लैटीट्यूड) वाले क्षेत्रों में यह खतरा 3 से 10 गुना तक बढ़ सकता है।यह सिर्फ तापमान का मामला नहीं है, बल्कि उन सामाजिक और संरचनात्मक खामियों का भी है जिनसे बुजुर्ग जूझते हैं। जैसे शहरी प्रदूषण, परिवहन की असुविधा और अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं, इनमें मुख्य हैं।

शहरों को बुजुर्ग हितैषी बनाने की सिफारिश
रिपोर्ट कहती है कि बुजुर्ग बेहतर सुविधाओं की चाह में शहरों की ओर पलायन करते हैं, पर वही शहर उन्हें हीटवेव और प्रदूषण की दोहरी मार दे रहे हैं। 2015 में दुनिया के 60 वर्ष से अधिक के 58% लोग शहरों में रह रहे थे। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में शहरी नियोजन को उम्र-हितैषी, प्रदूषण-मुक्त और हरित बनाने की सिफारिश की गई है। मौसम केंद्रों में निवेश के साथ सामुदायिक चेतावनी तंत्र व आपदा जोखिम प्रबंधन को भी बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताया गया है।

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15-मिनट सिटी का विजन अपनाएं
रिपोर्ट में 15-मिनट सिटी रणनीति अपनाने की सिफारिश की गई है। इसका अर्थ है कि हर नागरिक को आवास, स्वास्थ्य, बाजार, सार्वजनिक गार्डन और परिवहन जैसी आवश्यक सुविधाएं 15 मिनट की पैदल या साइकिलिंग दूरी पर मिलें। इस मॉडल से बुजुर्गों को लंबे सफर से राहत मिलती है। कार पर निर्भरता घटती है, जिससे वायु प्रदूषण भी कम होता है।  

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जागरूकता  
2025 की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने बुजुर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव पारित किया है। यह पहल स्पष्ट संकेत है कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन अब महज पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी बन चुकी है।

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